Friday, June 3, 2022

सबसे प्यारी मेरी साइकिल


( विश्व साइकिल दिवस)
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कभी घर में साइकिल थी पर पापा ने उसे किसी को दे दिया। हम दोनों भाई छोटे थे तो किसी को नीचे से (कैंची) साइकिल चलाते देख ललचा जाते थे। इंतजार होता था कि घर में कोई स्टूडेंट आए और हम उनसे साइकिल मांग कर थोड़ा आगे-पीछे कर लें। मन में एक कसक होती थी कि काश, हम भी साइकिल वाले होते।
मन की मुराद पूरी हो यह आसान नहीं था। मां के डर से हमलोग पापा से साइकिल लेने के लिए नहीं कह सकते थे। ऐसे में बचते थे बाबा और माई (दादी)। शनिवार को हम दोनों भाई बाबा-माई के पास पनेरीबांध चले जाते थे। वह दौर था जब देश में आपातकाल खत्म हुआ था। हमारे मन में दो बातें उठतीं थी ...संघर्ष हमारा नारा है और अनशन। ऐसे में, हमारे बाल मन में भी यह बात बैठ गई थी कि अनशन के बल पर कुछ हासिल किया जा सकता है।
हम दोनों भाइयों के पनेरीबांध पहुंचते ही पिआव और खीरमोहन सामने आ जाता था। भरपेट मिठाई खाने के बाद गांव में खेलने जाना और फिर शाम को आना। इस बीच माई की अमृत जैसी सेवई तैयार रहती थी, बढ़का डूभा (कटोरा) में भरकर। इससे पेट भरने के बाद जब देर रात गए (करीब नौ बजे) माई खाने को कहतीं तो हम दोनों भाइयों (ज्यादा मेरा) का अनशन शुरू। मांग बस एक-बाबा हमको साइकिल खरीद दीजिए। माई मनुहार करतीं-खा ल मुनू...खा ल गुड्डू। पर संघर्ष में कोई ढिलाई नहीं। वैसे वास्तविकता रहती थी कि सेवई से ही पेट इतना भर जाता था कि कुछ खाने की जगह पेट में रहती ही नहीं थी।
खैर, रात कटती और सुबह दस बजे तक पापा डालटनगंज से आ जाते। माई की शिकायत मुनू नखथू खइले, गुड्डू नखथू खइले। इसके बाद पापा कहते क्या बात है सुमनजी। सुमनजी सुनना कि अनशन समाप्त। पापा जब गुस्से में होते हैं तो मुझे सुमनजी कहते हैं। आज भी इस संबोधन को कभी-कभी सुन लेता हूं तो हालत खराब हो जाती है। एक बार (सन् 1979) की बात है कि पापा कॉपी जांचने रांची गए थे। रविवार को देर शाम वे लौटे तो पनेरीबांध आने का सवाल ही नहीं था। मेरा अनशन रविवार को भी जारी रहा। सोमवार की सुबह बाबा राजी हो गए कि चलो साइकिल खरीद देते हैं। मेरी शर्त थी कि पहले साइकिल दुकान पर चलिए, ऑर्डर दीजिए तब पापा को खबर कीजिए। हुआ भी ऐसा ही। रांची साइकिल स्टोर में ऑर्डर दिया गया रेले साइकिल कसने का। इसके बाद पापा को खबर भेजी गई। वे आए तो दुकान वाले ने उन्हें प्रणाम किया और आने का कारण पूछा। जब उन्हें जानकारी हुई तो 535 रुपये की साइकिल का बिल 500 रुपये हो गया। बाबा ने भी इतने ही रुपये देने की बात कही थी कि क्योंकि उन्हें छोटानागपुर बैंक से इतने ही पैसे वापस मिले थे। छोटानागपुर बैंक आज के झारखंड का अग्रणी बैंक था जो 1960 के आसपास डूब गया था। इससे कभी-कभी जमाकर्ताओं के पैसे वापस मिलते थे और बाबा को मिली यह आखिरी किस्त थी।
इसके बाद, विजयी मुस्कान के साथ मैं पापा के साथ साइकिल पर बैठकर डेरा लौट आया। उस समय हमलोग अग्रवाल साहब के घर में रहते थे। आज वहां ऐसी सड़क बन गई है कि ढलान और चढ़ान खत्म हो गया है। पर उस समय हम दोनों भाई ढलान में साइकिल पर बैठ कर बिना पैडल मारे देवब्रत बाबू के घर तक चले जाते जाते थे। वापसी वर्तमान के सुरेश सिंह चौक से होती यहां से शुरू ढलान भी करीब दो सौ मीटर का था। बाद में हम दोनों भाई साइकिल ठीक से चलाने लगे। पनेरी बांध जाना और वहां से अमरूद, शरीफा झोले में भरकर लाना शुरू हो गया। शुरुआत में जाते थे तब कोयल पर पुल नहीं था। पानी रहने पर कुछ पैसे लेकर लड़के साइकिल कंधे पर उठाकर नदी पार कर देते थे। बाद में पुल बना तो साइकिल चलाने का आनंद ही बढ़ गया। केजी स्कूल रोड से आगे आने पर सद्दीक चौक (नेता जी सुभाष चौक) से बिना पैडल मारे ही आधा पुल पार करने और फिर लौटते समय शिवलाल जी के होटल (तस्वीर यहीं की है) से बिना पैडल मारे आधा पुल पार करने का रोमांच ही कुछ और था। इस रोमांच को आज की बाइक वाली और दोनों छोर पर भारी ट्रैफिक देखने वाली पीढ़ी समझ नहीं सकती है।
इसी साइकिल से मैं अपने मित्रों के साथ 1983 में बेतला भी गया था। पहली बार जब साइकिल पंक्चर हुआ था तब बनवाते समय टायर और ट्यूब के दर्द को मैंने भीतर तक महसूस किया था। स्कूल जाने से लेकर कॉलेज जाने तक, छात्र राजनीति करने से लेकर पत्रकारिता करने तक कई यादें इस साइकिल से जुड़ी हैं। एक बार संभवतः 1991 या 92 में यह साइकिल चोरी हो गई। गुड्डू इसे लेकर कहीं गया था। लौटा तो यह गायब। दिल टूट गया बेचारे का। उसने अपने स्तर से खोज शुरू की। साइकिल चुराने वाले ने इसे पूरा नया रूप दे दिया था। उसे एक दिन साइकिल कहीं पर लगी हुई दिख गई। जब गुड्डू ने इस पर दावा किया तो वहां भीड़ लग गई। तब गुड्डू ने कहा कि मुझे इस साइकिल के सीट ने नीचे लिखा नंबर याद है यदि जिसके पास अभी यह साइकिल है तो वह उसे बता दे तो वह दावा छोड़ देगा। जिसके पास साइकिल थी उसके लिए इस सवाल का जवाब देना असंभव था। जब लोगों ने गुड्डू से पूछा तो उसका जवाब था 311H70। फिर साइकिल वापस, रंग-रोगन के बाद नए रूप में। बाद में यह साइकिल घर में दूध देने वाले को दे दी गई और यह यादों में समा गया। लॉकडाउन के दौर में पुरानी तस्वीरों के जखीरे में इसकी भी तस्वीर सामने आ गई तो इसकी यादों को शब्दों में संजो दिया।
साइकिल खरीदने का सिलसिला थमा नहीं था। पापा गाजियाबाद आए थे। सोमू-छोटू ने साइकिल खरीदने की फरमाइश अपने बाबा-दादी के सामने रखी जो तुरंत पूरी हो गई। पर साइकिल चोरी का सिलसिला भी जारी रहा। एक सप्ताह के अंदर ही वह साइकिल चोरी हो गई पर वापस मिलने का सिलसिला टूट गया।
यह कहानी सिर्फ मेरी साइकिल की नहीं है बल्कि असंख्य मित्र होंगे जिन्होंने इस तरह जिद कर साइकिल खरीदवाई होगी और सवारी की होगी।
सभी को विश्व साइकिल दिवस की शुभकामनाएं
©प्रभात मिश्रा सुमन
वरिष्ठ पत्रकार अमर उजाला नोएडा
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