Sunday, May 22, 2022

"हमर बचपन, तोहर बचपन"

 "का नन्हकू, नया-नया ड्रेस में स्कूल जा रहे हो!!!"

कोरोना से बंद पड़ल स्कूल के खुलने पर आज सुबह बगल के लइका को खूब जीट-जाट में आपन माई साथे बस का इंतेज़ार करते देखा, तो अपने समय का स्कूल का सिन आंखों के सामने चलने लगा।
हमनी के समय में स्कूल के नाम जादे मतलब नहीं रखता था। नामी दुकान वाला कोई बाते नहीं था। स्कूल नज़दीक रहे के चाही, बस्स, जादे कोई नाम लिफाफ नहीं। कोई गाड़ी या रिक्सा ना रहे, लावे ले जावे ला। आज कल के माई बाप त लइका के बुढाईत तक आगे पीछे नाचत रहsलन। आउ एगो हमीन रही कि सउँसे एरिया मखत रही, भर दुपहरिया।
हमर मउसी, एगो बियाह में ना गइल कि "बेटा का यूनिट टेस्ट है, पढ़ाई खराब हो जाएगा।" अब बताइये ABCD और गिनती सीखे वाला बच्चा के का पढ़ाई खराब होगा एक हफ्ता में। अब उ गार्जियन के कइसे बतावल जाओ कि दसवां के भुसगोलो बिद्यार्थी ABCD सीख जाला। लइका के परसेंटेज आज कल रेपुटेशन के बात हो गइल है, हमीन त परसेंटेज के माने भी सतवां क्लास में सीखे थे।
हमीन घड़ी मजाल था कि कउनो गार्जियन ट्यूशन लगावे ला मान जाते, दसवां के पहिले (उहो खाली गणित ला)। आज कल के नन्हन-नन्हन रेंगन ट्यूशन जाले
"का के ट्यूशन जात हें, बाबू?, त S.St. के।"
आज की तरह हमनी के पास कउनो बढ़िया Avenger वाला फैंसी बैग नहीं था। बल्कि कपड़ा के झोला में शुरुवाती वक़्त, कुछ दिन बाद बस्ता में, आउ तनिक गार्जियन के भरोसा हो गया कि लइका में टैलेंट है, तो बाद में अल्मुनियम के पेटी में।
परीक्षा खतम होये के बाद, आपन किताब बेचके, आउ दूसर से अगला क्लास ला पुरान किताब ख़रीदे में हमनी के कउनो हिचकिचाहट नहीं होता था। और वैसे भी कौन सा किताब और पाठ्यक्रम साले साल बदलने वाला था। लेकिन भाई, मजा तो आपन पुरान बेशकीमती किताब पे रद्दी अखबार के जील्द चढ़ावे में आता था, कसम से वार्षिक उत्साह जैसा महौल रहता था।
स्कूल में गुरुजी के हाथे मार खाए में, या स्कूल के बाहरे मुर्गा बने में, आउ गुरु जी के द्वारा लाल होखे तक कान मरोड़े में, हमनी के ईगो कभी आड़े नहीं आया। घर आऊ स्कूल में मार खाना त हमनी के दैनंदिन जीवन के एक सामान्य प्रक्रिया था । कहत रहन बुढ पुरनियाँ कि 'मार खाये से देह बहुत बजड़ होखs ला।'
आज के लइकन के जइसन हमनी कहियो पॉकेट मनी नहीं मांगते थे। काहे की हमनी के जरूरत भी बहुत छोटे छोटे रहता था। साल में कहियो मेला-उला में दू-चार बार झिरुआ, निमकी, दलमोट, बरफ खाये ला मिल जाता उहे बहुत होता था। आज के समय जैसा हर बात ला, मां बाप पर हमीन आश्रित नहीं रहते थे। छोट-मोट जरूरत तो संयुक्त परिवार में अईसही पूरा हो जाता था।
© राकेश भारती गोस्वामी और रोहित शुक्ला
May be an image of text that says "मेरे बचपन के दिन"

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