47 डिग्री तापमान कुछ है हम पलमुवा लोगों के लिए!!!!! गूगल बाबा से पूछ के देख लीजिए अपन देश के सबसे गर्म प्रदेश में दिखेगा हमर पलामू. मीमबाज़ लोग तो पलामू को सूरज और धरती के बीच में दिखाने से भी बाज़ नहीं आते। भारत में आउ कउनो जगह नहीं मिलेगा आपको जहां जाड़ा में लोगों को 'पाला' मार देता है और गर्मी में 'लू'. भले ही हम कितना ही लुभावना बात बोल लें जइसे की ' पलामू मतलब पलाश, लाह आउ महुआ'. लेकिन पलामू को 'पाला' और 'लू ' से ज्यादा औऱ कोई प्रभावित नहीं करता. इसके ऊपर तो बिजली की मेहरबानियां, सदियों से हम झेल ही रहे हैं. इसीलिये तो इतना आइकॉनिक है अपना "लालटेनगंज ".
गर्मी के दिन दिमाग में आते ही; ढ़िबरी, लालटेन, पेट्रोमक्स, सोलर लैंप, बेना, चटाई मच्छरदानी सब आंखों के सामने घूमने लगते हैं. हमारे उस पास मार्क्स में भी जो मेहनत और सुकून छुपी थी, वो आज की पीढ़ी की 99/100 परसेंटाइल में कहीं नहीं दिखेगी. एक एक नंबर मेहनत से कमाया हुआ लगता था एकदम.
लाइन कटा नहीं कि हम पालमुवासी जानते थे कि गड़बड़ी 'बी मोड़' से ही होगा. कई दफा सोचती हूं तो अच्छा भी है, ऐसे ही ब्लैकॉउट्स सहते हुए हम पलामूवासी काफी साहसी औऱ धीरज वाले बन जाते हैं, कहीं भी एडजस्ट करने की शक्ति रखते हैं. भारत में कहीं भी, परदेशी बन के भी - ख़तरनाक सर्वाइवल इंस्टिक्ट विकसित हो गई है.
नॉस्टलजिक तंद्रा को बिटिया रानी के एक सवाल ने भंग किया. " माँ यहाँ एकदम ग्रीन पेड़ पौधे नहीं हैं ना? नानू, नानीमाँ के पास तो बहुत पेड़ थे ". बिटिया की ऑब्जरवेशन काफी सही थी. जहाँ देखो यहाँ कंक्रीट का जंगल ही दिखता है, हरितिमा के दर्शन करने शायद कहीं शहर के बाहर जाना पड़ेगा.
पर सवाल भी ये उठता है की इतनी हरियाली होने, बेतला नेशनल पार्क, पलामू टाइगर रिज़र्व, कई सारे पेड़-पौधे, खेतों से युक्त गाँव से ज्यादा घिरे हुए शहरी क्षेत्र के होने, कोई बहुत बड़ी या मंझौली इंडस्ट्री ना होने, वाहन का धुंआ भी भयावह ना होने, हवा की गुनात्मक स्तर भी ठीक-ठाक होने के बावजूद गर्म लोहे को छूने जैसी हालत क्यूँ हों गयीं है?
जवाब के रूप में बिटिया के उन्ही पर्यावरणविद् नानू नानी माँ की वो दिलचस्प बातचीत याद आयी. चूंकि मुझे अरण्य की गहराईयों को टटोलने, मिट्टी की स्थायित्व को सूंघने की थोड़ी आकांक्षा हो रही थी तो मैंने सवाल किया की लोग 'सौ साल ' में परिपक्व होने वाले पौधे (जैसे की साल, सागवान )क्यूँ लगाते हैं जब उस पेड़ से सम्बंधित मुनाफे को भोगने के लिए वो जीवित ही नहीं रहने वाले.
पिताजी ने जवाब में पूरा तरीका समझाया की एक अरण्य कैसे रोपा जाता है. रोपण इसलिए आवश्यक है क्यूंकि ईश्वर प्रदत्त जंगलों को हम इंसानों ने कंक्रीट के जंगलों से भर दिया है, अब मौलिक जंगल बचे ही कहाँ हैं? वन विभाग ने अपनी प्रयासों से जंगल बनाने /बचाने की कोशिश की, उसके लिए पूरे इलाके को कूप में बाँटा जाता है, जिस जलवायु के हिसाब से जिस वृक्ष के पल्लवित होने की संभावना होती है, वही रोपा जाता है. वृक्ष कटाई के समय सबसे ज्यादा पुराने, बूढ़े हों चुके वृक्षों को काटा जाता है जिसमें अब फल लगने की कोई उम्मीद ना हों औऱ नयी पत्तियां भी उत्पन्न ना हों रही हों. सूखे हुए पेड़ की लकड़ी भी इतने काम की होती है.
फूल, फल, हरियाली, छाया, छाँव, झूला, सहारा, मित्रता, रोज़गार औऱ सब ख़तम होने के पश्चात् लकड़ियों से मुनाफा- इतने पर्याय हैं पेड़ों के की शब्द कम पड़ जायेंगे. तने के ऊपर जो स्पष्ट घेरे होते हैं ना उससे सिर्फ उस वृक्ष की उम्र नहीं पता चलती, बल्कि कहानी भी जो उस वृक्ष ने वर्षों से अविचल एक स्थान पर स्थिर हो देखी, परखी औऱ झेली हो. सही तरीके से सबसे पुराने सूखे पेड़ को चिन्हित करके काटा जाता है और नियम ये है कि एक काटे पेड़ की जगह 3-4 नये पौधे लगाए जाएं. वन विभाग लगवा भी देता है पर उनको पोषित करने में ढिलाई हो जाती है. दूसरा कारण हरे पेड़ काटना है, पेड़ को सूखने से पहले ही काट डालना. तीसरा कारण है अवैध कटाई, जलावन की लकड़ियों के लिए औऱ स्वतंत्र व्यावसायिक बुद्धि वाले मनुष्यों की कुल्हाड़ी से ग्रस्त हो चुके हैं वन क्षेत्र.
मेरे मन में रेलवे कॉलोनी औऱ ओवरब्रिज से लगे उस टाल का चित्र तैर गया जहाँ मोटे मोटे विशाल वृक्ष अलग अलग ढेर में रखे गए हैं. मॉर्निंग वाक में प्रतिदिन उन्हें देख कर बहुत अकबक लगता है की मानो किसी पाप के बेबस मूकदर्शक बन खड़े हों हम. इतनी सारी गौरव गाथा को यूँ जमींदोज़ होते देखना आसान थोड़े ही है.
हम भावुक पिता- पुत्री की बातें चुपचाप सुनती मेरी माँ ने इतनी देर बाद कहा- " काहे का नियम कानून जी? पाप है ये सब पाप! चाहे तो नियम से काटा जाये या अवैध रूप से, पेड़ काटना बस पाप है. धर्मग्रंथों में लिख देना चाहिए, लिखा भी है - तुलसी पूजा,आँवला की पूजा, बरगद, पीपल की पूजा, आम पल्लव, केले के पत्तों का महत्त्व. पर लोग माने तो ना. नियम कानून सख्त बनाने चाहिए,औऱ पालन भी. " माँ मेरी कम बोलती है लेकिन सटीक बोलती है. वो ताड़ का पंखा उसी ने सबसे ज्यादा झला है, पलामू में रही भी वो सबसे ज्यादा है. गहरा पहचानती है वो परेशानियों को.
शायद अगली बार बेतला जाऊं तो पेड़ ज्यादा दिखे, जलस्त्रोत सूखे ना मिलें, गर्मी थोड़ी कम हों. बारिश अच्छी खासी हो. मैं तो उड़ती पंछी हूं, ऑप्टिमिस्टिक बनने का दिखावा कर बस पूछ सकती हूं सरदर्द की गोली के विज्ञापन के जैसा - " कुछ करते क्यूँ नहीं "? घोंसला कहीं भी बनाया हो मैंने, इतना जरूर कोशिश करूंगी की आसपास हरितिमा उत्पन्न कर सकूं. हरी बातें करने, हरा चश्मा पहन बैठ जाने से महत्वपूर्ण है हरीयाली बढ़ाना. कोशिश ज़रूर करुँगी. आखिर जड़ के आसपास की अबोहवा ठीक जो करनी है. क्या आप भी ऐसा कुछ करेंगे?
©शिवांगी

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