बाबा कहा करते थे...
"एतवार मने खाली छुट्टिये के दिन नाहीं होखला, एतवार मने बाल- नाखून कटवावे के दिन भी होखला।"
तो ऐसे ही एक एतवार के दिन हम सब बच्चे बाल-नाखून कटवाने के लिए दुरा पर लाइन लगाकर बैठे थे। एक-एक करके ठाकुर बाबा सबको निपटाए भी जा रहे थे, तभी हमने देखा कि कुछ आठ-दस लोग जिनमें से कुछ अजीब रूप-ढंग में थे, ढोल-खंजड़ी आदि बजाते हुए हमारे दरवाजे पर आ धमके। वे रेघाते हुए कुछ गा भी रहे थे,
अचानक से हुए इस शोरनुमा हमले से हम बुरी तरह डर गए और दौड़कर गेट के अंदर आ गए और वहीं से झांकने लगे। हमने देखा उनमें से एक-दो लोगों ने औरतों वाले कपड़े पहन रखे थे,एक ढोलक बजा रहा था और बाकी घुंघरू या खंजड़ी बजाते हुए गाने को दोहरा रहे थे। हमारी आजी ने कहा,
"पंवरिया आईल बड़े जाके टोला-टाटी से सबके बोलवले आव।" देखते-ही-देखते रेंगा-चेंगा लेले हमरे दूरा पर कोई साठ-सत्तर लोग जमा हो गए। अब हमारा डर भी थोड़ा कम हुआ, लेकिन बाहर आने की हिम्मत नहीं हुई। हमलोग गेट के अंदर से ही झांक कर देखने लगे। बाहर नाच गाना शुरू हो चुका था। आगे-आगे ढोलकी वाला पंवरिया गा रहा था...
"एक मुट्ठी चऊरा फूलवली
फंकहु नाही पवली में हो
ए ललना उठले कमर बिच पीड़ा
त दर्दे व्याकुल हो...."
और पीछे-पीछे बाकी पंवरिये उसे दोहरा रहे थे। बीच-बीच में गांव की औरतें खुश होकर उन्हें नेग के रूप में रुपया-पैसा, चावल-दाल, लूगा-धोती जो भी अपने घर से ले कर आई थीं, सब उनके फैलाए चादर पर रख रही थीं। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था तभी हमारा छोटा भाई बाहर निकल गया जो लगभग साल-डेढ़ साल का रहा होगा। अचानक से ढोलकी वाला पंवरिया उठा और बाबू को गोद में उठाकर अपने ढोल पर बैठा लिया और जोर जोर से गाने लगा,
"जियो-जियो रे झडूला
तेरा नाना आएगा
घोड़ा चढ़ल नाना आवे
मोहर लूटावत आवे
मने मुसुकावत आवे
जियो-जियो रे झडूला तेरा बाबा आएगा..."
और बाकी सभी पंवरिए भी उठकर नाचने लगे। हम सभी बुरी तरह डर गए, हमें लगा कहीं ये बच्चा चोर तो नहीं हैं। हमारे बाबू को ले तो नहीं जाएंगे, लेकिन क्या देखते है कि बबुआ ढोलक पर बैठकर हंस रहा था। इसी तरह एक के बाद एक सोहर, बधैया, ननद गारी, खिलौना गीत आदि गाने के बाद उन्होंने नेग मांगना शुरू किया। बाबू के बाबा ,पापा, चाचा, दादी,माई, चाची सब के पास बारी-बारी से जाकर नेग का मांग किया। कुछ देर के मान-मनौवल, कमी-बेसी देखते हुए उनको नेग दिया गया। उन्होंने बाबू को खूब दुलारा, खूब छोह किया, दुआएं दी और फिर वहां से हंसी-खुशी निकल गए। किसी दूसरे द्वार की तलाश में जहां हाल-फिलहाल किसी बच्चे का जन्म हुआ हो। वे वहां जाएंगे, बधाइयाँ देंगे, कुछ नेग लेंगे और फिर अगले द्वार की तलाश में निकल पड़ेंगे।
ये पंवरिया समुदाय के लोग हैं, जो मूलतः बिहार के रहने वाले हैं। ये पलामू के गाँवों-कस्बों आदि में बच्चों के जन्म पर बधैया गाते अक्सर दिख जाया करते थे। हमारी माँ कहती हैं, "पंवरिया के परान (प्राण) पांचे गो चीज में बसेला
१.गीत
२.बाजा
३.पोशाक
४.नाच
५.गितिहारा
गीत में सब सोहर, बधइया, ननद गारी आउ अंत में खिलौना गीत गाव हथिन, बाजा में सब ढोल,ढोलकी, खँजड़ी,आउ घुंघरू बजाव हथिन। पोशाक में घघरा-चोली के साथे ओढनी पहिन हथिन। एगो जे ढोल पर रेंगा के बैठा के नचाव हऊ उ मेन आदमी रह हऊ आउ बाकी सब गितिहारा रह हथुन जे साथे-साथे गीत गाव हथुन।"
बाद के सालों में पवरिया नहीं आए। बाकी बच्चों को किसी ने उस प्यार और आनंद से ढोल पर नहीं बिठाया न ही नचाया और ना ही किसी ने वह रस भरे गीत गाए, जो पंवरिया गाया करते थे। अब जन्मोत्सव पर भी खोखली आधुनिकता ने अपना कब्जा जमा लिया है। बड़े-बड़े रेस्तरां में पार्टियां होती हैं और हम भी वहाँ भेरवट पुराने ही जाते हैं। सज-धज कर हाथ में गिफ्ट का पैकेट लेकर पार्टी में जाते हैं गिफ्ट पकड़ा कर पेट पूजा करते हैं और वहाँ से निकल लेते हैं।
आज पंवरिया समुदाय हाशिए पर हैं। वे अपना पुश्तैनी कार्य छोड़कर परिवार के भरण-पोषण के लिए पलायन कर रहे हैं। कुछ कलाप्रेमी या तथाकथिक संस्कृति की रक्षा करने वाले कभी-कभार कोई कार्यक्रम आयोजित कर उनका उत्साहवर्धन कर देते हैं, लेकिन इतना पर्याप्त नहीं है। अपनी इस बहुरंगी संस्कृति को बचाने हेतु हम सभी को अपने-अपने स्तर से इसके लिए प्रयत्न करना होगा।
क्या आपके आस-पड़ोस में भी पंवरिया आते थे? क्या आपने भी उनके गाये रसभरे गीतों को कभी सुना है? आप अपने अनुभव को हमारे साथ साझा करें ठेठ पलामू के माध्यम से।
©जयानन्द शुक्ला

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