कभी-कभी लगता है, जैसे पलामू में 'म' से महुआ नहीं मजदूर होता है और मजदूरों का पलायन पलामू का सबसे बड़ा अभिशाप है। कोविड काल में प्रवासी मजदूरों की वापसी का दर्द आज भी हम सबके जेहन में है। कठिन शारीरिक श्रम करने वाले वर्ग को मजदूर कहते हैं, लेकिन ये भी सत्य है कि इन्हें इस श्रम के बदले उचित मजूरी घर के नजदीक मिल ही नहीं पाता है। या साफ शब्दों में कहें तो पलामू जैसे जगहों पर रोजगार ही उपलब्ध नहीं है।
मनरेगा जैसी योजना रोजगार की गारंटी तो देती है, लेकिन उसका सही से क्रियान्वयन नहीं होना, समय पर काम नहीं मिलना, मजदूरों की जिंदगी को और ज्यादा कठिन बना देता है। हर चौक-चौराहों पर सुबह-सुबह मजदूरों की सैकड़ों की संख्या में भी भीड़ लगी होती है। पलामू की तपती दुपहरी में शारीरिक मेहनत सबसे कठिन काम है। हम और आप थोड़े देर धूप में खड़े होने की कल्पना से ही घबरा हो उठते हैं। वहीं उन्हें दो वक्त की रोटी के लिए जी तोड़ मेहनत करना पड़ता है। खुद ही सोच कर देखें, क्या इतने मेहनत के बाद भी एक इंसान सम्मानजनक पैसे का हकदार नहीं है। क्या उसे हक़ नहीं कि उसे अपने उज्ज्वल भविष्य के सपने देखने का।
श्रम विभाग कई योजनाएं तो चलाती है, लेकिन सब कागज में ही सिमट कर रह जाते हैं। मजदूर नेता बड़ी-बड़ी गाड़ियों में दिखाई जरूर पड़ते हैं, लेकिन उनके हक के लिए वास्तविकता में कोई नहीं लड़ रहा होता है। एक मजदूर के गरीब बने रहने में ही नेताओं की आलीशान इमारतों के खड़े रहने की गारंटी है। अगर एक मजदूर गलती से भी बीमार पड़ जाए तो स्वास्थ्य की चिंता तो छोड़ ही दीजिये, खाने को लाल पड़ जाएंगे उन्हें। यदि एक हफ्ते के लिए भी सारे मजदूर कार्य करना बंद कर दें तो चारों ओर सिर्फ बर्बादी का ही आलम दिखेगा।
कोरोना में जब बहुत सी अमीर राज्यों की सरकारों को मजदूरों की घर वापसी के दुष्परिणाम समझ मे आये, तो उन्होंने मजदूरों को एक तरह से बंधक बनाने और उनके घर वापसी को रोकने के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाये थे। इसलिए मजदूरों को आर्थिक व्यवस्था की धुरी कहा जाता है। किसी भी क्षेत्र में असली विकास पुरुष मजदूर ही होते हैं। आपके आराम की विलासिता वाली चीज़ों, घर, सड़क, आपके भोजन की थाली सभी के निर्माण में मजदूरों का खून पसीना की तरह बहता है। ऐसे में हम सबों को अपने मजदूर भाइयों को वो सम्मान और हक़ देना होगा जिसके वो हक़दार हैं। सिर्फ दो अक्षर ज्यादा पढ़ जाने से समाज की हर सुविधा के अगर आप हक़दार बन जाते हैं तो हमारे मजदूर भाइयों के हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी उनका भविष्य उज्ज्वल क्यों ना हो? ऐसे समाज की नींव कितने दिन टिकी रहेगी खुद सोच कर देखिए जरा।
जरूरत है हमारी सरकारों को चेताने का और उन्हें सोचने पर मजबूर करने का कि वक़्त रहते अगर मजदूर भाइयों की आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य की स्थिति पर ईमानदारी से कार्य नहीं किया गया, तो हमारे समाज को बर्बादी के कगार पर पंहुचने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।
© सन्नी शुक्ला

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