Thursday, June 9, 2022

पलामू वाली बात बंगलोर में कहाँ

---------------------------------
चलते वक़्त मेरी निगाहें औऱ सर दोनों ऊँचा देखना पसंद करते हैं। जितने भी ऊँचे भवन के छत , उनपर लगे मधुमक्खी के कुछ अधूरे कुछ पूरे छत्ते, पेड़ों की फूँगी, आसपास कलरव करते चिड़ियों के बच्चे, ऐसे शीर्ष सम्बन्धी कोई भी सवाल पूछ लिया जाये हमको कोई परेशानी नहीं है।
जब गार्जियन बने ना, तब जाके बुझाया कि बेट्टा, जन्ने-मन-तन्ने घूमे के दिन गए अब। पहिले करोना रोलाया, फिर बिटिया का स्कूल। हमहुँ दांत पजउले थे कि अबकी तs गर्मी छुट्टी में बहरे जाना है घूमे, चाहे जे हो जावे।
सब तरकीब सोचे के बाद बंगलोर जाने का प्लान हुआ। वैसे भी एक महीना ला शिमला आउ मनाली के जाता है बताइये। बंगलोर एक अइसन जगह है, जहाँ डाल्टेनगंज के सब घर के एकाध आदमी जरूर दिखेगा।
बंगलोर गइला पे मने अइसा लगा ना, जइसे भट्टी से निकाल के फ्रीजर में डाल देवल गइल हो। एकदम बिहाने मॉर्निंग वॉक करे निकले हम। एतना रकम के कुत्ता दिखा ना रोड पे कि का कहें। आदमी से जादे कुत्ता सब मॉर्निंग वॉक कर रहा था। हमको भी बिदेश वाला फीलिंग्स आने लगा। हमहुँ उपरे मुड़ी, नीचे गोड़ करके रपेट दिए। कुछु कहिये सुंदर-सुंदर बिल्डिंग सब देख के मन एकदम तृप्त हो गया। मेरा तो पाँव रुकिए नहीं रहा था।लेकिन ब्रेक लग गया एकदम।
हाय रे हमर किस्मत!!! इंडिया में कउनो जगह जाइये, रोड पे गढ्ढा ना मिले, अइसा कइसे हो सकता है। होना का था, गोड़ पड़ गया था गढ्ढा में, मुँह के बल सीधे औंधे मुंह जमीन पे तारे देखने लगे। सडक किनारे गिर के ज़मीन पर बैठे थे औऱ मेरे साथ / आगे / कुछ कदम धीरे चलने वाले लोग भी बिना कुछ पूछे सिर्फ एक सरसरी निगाह डाले राउंड पर राउंड लगा रहे थे। जाने क्यूँ अजीब लगा की किसी ने ये ना पूछा, की बेटा क्या हुआ?
इहे डाल्टेनगंज रहता तो अभी रोड जाम हो गया होता। कसम से उ घड़ी हमरा आपन शहर के बहुत याद आया।
एक बार के बात है, मने बहुत पहिले का। इंटर में हम नया-नया स्कूटर चलाने सिखे थे। बाबूजी से जिद करके ट्यूशन में सबके दिखावे ला स्कूटर से जा रहे थे। रेड़मा चौक पे स्कूटर लेले गढ्ढा में घुस गए। होना का था, सब आपन काम छोड़ के हमरा उठावे में लग गया। कउनो हाल चाल पूछे लगा, कउनो बाबूजी के नाम पता। एगो कहे लगा कि नमधारी जी से इ गढ्ढा कहियो ना भरायेगा। अबरी भोट रोड पे देना है। एगो चचा बेचारे स्कूटर उठा के पोंछे लगे। एतना अपनापन था न पूछिये मत। पूरा भौकाल बन गया था हमर।
बहरहाल, उस समय हमको उठाने मेरे घरवाले जिनको फ़ोन कर दिये थे,आये. - मेरी गोतनी बहन ने पूछा, " दीदी क्या आपने किसी से मदद मांगी थी "? सवाल बड़ा गूढ़ था क्यूंकि सचमें मदद मांगना तो दूर, अंदर ही अंदर दर्द से कसमसाते हुए, ऊपर से एकदम स्थिर दिखने कि कोशिश करते सोच रहे थे , ऐसे अचानक किसी को ज़मीन पर बैठा देख लोग क्या सोच रहे हैं? ( क्यारियों से फूल चुन रही है , या इटें गिन रही है?)
तो बस अब हम हैं औऱ मेरे बाएं पैर का नीला पलस्टर जो मुँह बाए उसी तरह हमको इग्नोर करता है जैसे हम अपने पैरों को करते थे , साथ में एक छड़ी भी जिसके सहारे थोड़ा बहुत चलने के अलावा कमरे के स्विच बोर्ड को चलाने, बुतरूअन को हवा में उसे घुमा डराने औऱ धम्म से आवाज़ कर लोगो को अपनी विवशता का एहसास करवाने औऱ मन ही मन कुटिल मुस्कान के साथ सोचने -'कि आज हम बंद हैं तो क्या, कल फिर चरणजीप पर हम हवाओं से गुफ्तगू करेंगे' - इसके अलावा कुछ नहीं कर सकते।
ठंडा जगह में रहे से जादे सब इंसान लोग भी ठंडा हो गइल है। कहे ला आपन देश है, पर अंग्रेज़ियत ने सबको परदेशी बना दिया है। चाहे जईसन है, हमर ठेठ पलामू; लू-लक्कड़, आनी-बानी, पाला सब झेलने के बाद भी गर्मजोशी में हम लोग को कोई फेल नहीं कर सकता है। संवेदना सिर्फ सुनने में आसान लगती है, पलमुआ लोग के मुंडी में घुस भी जाती है, पर इसे महानगरीय सभ्यता को समझाना या उनमें हो- ऐसी कोई उम्मीद लगाना कोयल नदी में गिर गयी सुई ढूंढ़ने जैसा है।
अब बस आह से अहा तक का इंतजार है...ठीक है ना?!
©शिवांगी
May be an image of text that says "ठेठ पलामू ©शिवांगी"

No comments:

Post a Comment