#ठेठ_पलामू:- घामा में माई के हाथ के खाना
--------------------------------------------------
जाड़ा के दिन में अगर सबसे ज्यादा कष्ट है तो उ है #ऊपरी_बेरा ( दोपहर के बाद) खाने में और गलती से खा लिए तो उ कँपकँपी धरता कि तुरन्त भर में सब साल सूटर पहिनना पड़ जाता है। अब हमर घरे ऐसे भी संयुक्त परिवार , ऊपर से जाड़ा में दिन अपने छोट करता है। काम धंधा में कब 3-4 बज जाए पता ही नहीं चलता है, अब भोरे-भोरे, खाना-पीना नहा धो के तो बन जाता था। पर जनाना सब के खाने में 3 -4 बजना तय था। चाहे केतना ई चरबजीवा खाने के चलते डाँट भी सुने लेकिन काहे कोई सुधरे वाला था।
अब गाँव वाला स्कूल में पढ़ते थे, तो खाने-पीने का कोई रूटीन तो था नहीं दिन रात में मिला के 4 -5 बार भी हो जाता था। अब बाकी दिन तो स्कूल से आते-आते देरी हो जाता था, पर शनिचर, एतवार के दिन हमको भी चरबजीवा खाने में मौका मिल जाता था। कहीं से खेलते-कूदते अंगना में आते तो देखते माई-चाची सब बैठ के खा रहे हैं। अब ई टाईम अँगने एगो जगह रहता था जहाँ #घाम(धूप) रहता था। अब लईका चाहे कोई केतनो बड़का हो जाये माई के सानल आऊ माई के हाथ के खाना के कोई तोड़ थोड़े है। बस माई खाते रहती आके बैठ जाना था। हाथ धोने के जरूरत तो था नहीं, काहे कि खुद से तो खाना था नहीं। अब आराम से माई दुलार से खिलाते रहती। बाकी चाची लोग भी अगल-बगल अपना खाते रहते। खाना तो बनल रहता था दिन का ही तो केतनो आज के जईसन गैस थोड़े न था जे गरम रहता। एकाध आईटम के भले चूल्हा पर चढ़ा के छोड़ दिया जाता था ताकि हल्का राख उख से गरम रहे और दूसरा #दन(तरफ) तसला- डेगची (बटोही) में पानी गरम होने के लिए चढ़ल रहता था।
अब गरम खाना में जेतना स्वाद घीव(घी) डालने से आता है, उससे कहीं जादे सवाद(स्वाद) ठंढा खाना में करुआ तेल डालने से आता था। फिर का शाम के जब भी मौका मिलता था। तो उहे खाना में रहता था। कभी सेम के थासल सब्जी तेल भात , तो कभी बैगन के थासल सब्जी तेल भात लेमो के अचार, ई सब एकदम फेवरेट खाना रहा है। उसी में आजकल फूलगोभी मटर नयका आलू के रसदार सब्जी तेल भात, बारी में कर हरियर टमाटर, धनिया पत्ती के चटनी और बारी में के मुरई मिल जाता, तो फिर तो पूछिये मत। आज तक लगभग इतना जगह घूमे केतना देश विदेश के अलग-अलग खाना खाए, लेकिन एकर तोड़ आज तक ना मिला। अब सोचिए न कि खुद से खाने में मन के हिसाब से आदमी जे मन से उठा के खा लेता है। लेकिन माई जब अपने हाथ से खिलाए, तो उ अपन अंदाज से ही जान जाती कि हं अब ई तो अब ई खिलाना है।
माई के हाथ से खाये के सबसे ज्यादा मजा हमको ही मिला है। लेकिन माई जब इत्मीनान से खाना सानती थी, तो देख के केतनो के मुँह में पानी आ जाये। अभियो तक घरे के लईकन भले सब बड़हन हो गए हों, लेकिन खाते देख लेने के बाद मजाल है जे दू कवर माई के हाथ से न खाएँ। हम तो अभियो मौका मिले तो चूकते नहीं है। अलग बात है कि अब मौका कम मिलता है। खाने टाईम दुनो दादी अपन-अपन गड़ी के तेल के डिब्बा लेके बईठल रहते । यहाँ-वहाँ के बात चलते रहता। जब तक घामा खत्म न हो जाए, तब तक सब के जगह अँगने में रहता था।
मन तो लिखते-लिखते करने ही लगा खाने का फिलहाल जे खुद बनाये है, उसी से काम चलाते हैं।
© आनंद केशव 'देहाती'

No comments:
Post a Comment