मेरे पलामू के पुरुषों
क्या अभिवादन लिखूं समझ नहीं आ रहा।पाठकों में कई नवजवान मेरे शिष्य होंगे,कई सहकर्मी, मित्र, सहयोगी, रिश्तेदार या बुजुर्ग भी। पिछले 6 दशकों से इसी पलामू में हूँ।बीच के कुछ वर्ष बाहर के भी हैं पर पलामू आना लगा ही रहा।यहाँ के मर्द अपनी पत्नी को भी "आप 'संबोधन देते हैं। बच्चों को आप कह बात करते हैं। अच्छा ही नहीं बहुत अच्छा लगता है। ये तहजीब आपको विशेष बनाती है।
आज महिला दिवस है। उन्हें बधाई दी जाएगी। छोटे बडे समारोह होंगे। फेसबुक पर बधाईयों की बाढ़ आएगी। उसे महंगे उपहार मिलेंगे। तारीफों के पुल बांधे जाएंगे।आपको भी लगेगा चलो एक दिन की ही बात थी हो गया । स्त्री पुरुष की समानता की बहस ठंडी पड़ जाएगी।
क्या आपलोग स्त्री के मन को जानने की कोशिश करते हैं? वो कभी भी इस प्रतिस्पर्धा को नहीं चाहती। उसे मखमली डिब्बे में चमकते दमकते उपहार नहीं चाहिए। लाल गुलाब के गुच्छे उसे सुख नहीं देते। महँगे होटल की दावत उसे नहीं लुभाती। ये तो क्षणिक आनंद हैं।
अगर दे सकते हैं तो उसे स्नेह दें,सम्मान दें। हर छोटे बडे फैसलों में बराबरी की हिस्सेदारी दें। ये तुम्हारा घर है का अहसास करायँ। उसकी बेपनाह भावुकता की कद्र करें। आपके मकान को घर उसने बनाया है,वंश व कुल को आगे बढ़ाने वाली स्त्री को वो स्थान दें जिसकी वो हकदार है।उम्मीद है पलामू के पुरुषों तक मेरा संवाद पहुंचेगा। अगर धृष्टता हुई हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ,।वैसे सोचियेगा जरूर।
शुभकामनाओं के साथ
© रेणु शर्मा

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