चाय पीने का प्रचलन वैसे तो 750 ईसा पूर्व से है! पर हमारे जीवन में चाय का प्रवेश नौवीं कक्षा में हुआ ! बाबूजी के स्कूल से घर लौटते माँ लकड़ी के चूल्हे पर 'लेवकन ' लगे कड़ाही में दूध वाली चाय बनाया करतीं । फिर धीरे धीरे ये हमारी डयूटी हो गई। ये सब देखते देखते न जाने कब चाय की लत लग गयी।
चाय जिसे ठेठ पलामूंवा में लोग #चाह बोलते हैं, ये है ही निराला पेय पदार्थ। तभी तो ये गरीब से गरीब और अमीर से अमीर हर तबके के लोगों का पसंदीदा पेय है और मेहमान नवाज़ी का सबसे सस्ता, सुलभ साधन भी! 'चाह' शब्द बचपन से जेहन में रहा, जब बुलाकी राम ( हमारे बचपन के स्कूल चपरासी) अपनी बचत के ज्यादातर पैसे *चाह* के लिए संजोकर रखा करते थे। हमारे घर चाय पीने के बावजूद भी उनकी चाय की *चाह* कम नहीं होती कभी। हो भी क्यों, चाय है ही ऐसी दिल फरेब चीज, जिससे न कभी मन भरता है न कभी चाहत कम होती है इसकी। तभी तो बड़े से बड़े मसले *चाय पर चर्चा* के दौरान चुटकी में हल जाते हैं। इतना ही नहीं लड़की दिखाई की रस्म में भी चाय की भूमिका काफी अहम है। लड़के वालों के समक्ष लड़की की पहली प्रस्तुति चाय पानी के साथ ही होती है।
कहा जाता है एक चीनी सम्राट भारत आए थे और गर्म पानी पीने के दौरान उनके ग्लास में कोई पत्ती आकर गिर गई और पानी का रंग लाल हो गया जिसका स्वाद बिल्कुल अनोखा और ताजगी देने वाला था। उसी समय से चाय की शुरुआत हुई और अब चाय दुनिया का सबसे अधिक पसंद किया जाने वाला पेय बन चुका है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि चाय से स्वागत हर तबके के लोग कर सकते हैं, यह ज्यादा महंगी भी नहीं, और आसानी से बन भी जाती है।
किसी के भी घर जाइए तो कुछ मिले न मिले चाय तो मिल ही जाती है और हम जैसे लोगों के लिए इससे बड़ी बात क्या होगी! क्योंकि चाय मेरा सबसे पसंदीदा पेय है, चाय की चाहत उम्र के साथ साथ बढ़ी ही है, कम नहीं हुई। पर यह बात दावे के साथ कह सकती हूं कि सबसे अच्छी चाय माँ के हाथ की, बंधु के होटल की और अब सबसे पसंदीदा #हस्बैंड_के_हाथ_की_चाय है! लाख कोशिश के बाद भी मैं वैसी चाय नहीं बना पाती, या यूं कहें कि बनाना चाहती ही नहीं, ताकि उनके हाथ की चाय मिलना कहीं बंद न हो जाए! एक ही तो पसंदीदा पेय है मेरा, गर्मी में भी चाय ही पीती हूं न कोल्डड्रिंक, न लस्सी, न आइस्क्रीम। ठंड के दिनों में तो चाय से प्यारी कोई चीज नहीं लगती। सुबह की शुरुआत चाय से ही होती है, सूप की भी बारी चाय के बाद ही आती है।
चाय हर मौसम, हर माहौल में पिया जाने वाला मशहूर पेय है। अब तो तरह तरह की चाय उपलब्ध है, जैसे तंदूरी चाय, ग्रीन टी, ब्लैक टी, रोज टी, पुदीना टी आदि। पर हमको तो साधारण दूध वाली चाय ही पसंद है, वह भी अपने घर की! सेहत के लिए ग्रीन और ब्लैक टी अच्छी होती है, पर मन को भाती नहीं कभी। इसलिए पुरानी परंपरागत चाय ही पसंद है और जीवन का अहम हिस्सा भी है। सुबह की शुरुआत चाय से, शाम का स्वागत चाय से, मेहमान नवाज़ी चाय से, क्रिकेट मैच का रोमांच चाय के साथ, खुशी में चाय, तनाव में चाय, महफ़िल में चाय, तन्हाई में चाय! हर पल का साथी है चाय!
पत्नी को खुश रखने का इकलौता हथियार भी चाय ही है। पतिदेव को कुछ आए न आए, चाय बनाना तो सीख ही लेते हैं कैसे भी, पत्नी को किचन से इसी बहाने ब्रेक मिल जाता है और खुश भी हो जाती हैं । गुड़ चाय भी बेहद स्वादिष्ट और सर्दियों में फायदेमंद मानी जाती है, जरूर पीकर देखें, सोंधी लगती है । चाय तो सस्ता और सर्वसुलभ साधन है आवभगत का, पर इसे परोसने वाली प्याली स्टेटस सिंबल मानी जाती है बहुत से घरों में! बोन चाइना, ला ओपाला, की प्यालियों में चाय देना संपन्नता का सूचक माना जाता है पर मेरे जैसे ठेठ लोगों को तो मिट्टी की खुश्बू वाली कुल्हड़ की चाय सबसे अधिक पसंद है, ये अलग बात है कि रोज उसमें पीना संभव नहीं हो पाता इसलिए चीनी मिट्टी के कप ही इस्तेमाल करती हूं ।
सबसे मजेदार बात तो यह रही कि ' ठेठ पलामू' ने भी अपने पसंदीदा लेखकों और पाठकों के लिए चाय की कप ही उपहार स्वरूप चुना!
आप लोग भी अपने जीवन से जुड़े चाय से संबंधित संस्मरण शेयर करें, अच्छा लगेगा..
© Sharmila

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