मैं जब पहली बार नागपुर,महाराष्ट्र से पलामू आई, सब कुछ मेरे लिए बिलकुल ही अनजान था. न मुझे यहाँ के लोगों के बारे में पता था न ही उनके खान-पान-परिवार या परिवेश के बारे में कुछ अंदाजा.
फिर एकदिन फेसबुक पर ठेठ पलामू से मुलाकात हुई. फिर क्या? पोस्ट दर पोस्ट मैं और ज्यादा पलामू के रंग में रंगती चली गयी. आज आलम ये है कि मेरे पास पड़ोस के लोग कहते हैं कि मैं पलामू को उनसे ज्यादा ज्यादा जानती समझती हूँ. चाहे बात पहनावे-ओढ़ावे की हो या भाषा-तीज -त्योहारों की मुझे ऐसा लगता है जैसे बात मेरे जन्मस्थान की हो रही हो.
शुक्रिया ठेठ पलामू!
@ दिशा खेतान

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