Saturday, March 20, 2021

अंखमुना


#अंखमुंदा बचपन के प्रिय सामानों में से एक था। जेबखर्च के नाम पर जो भी पैसे मिलते थे उसमें से बचत करके अंखमुंदे को भरने की होड़ सी होती थी भाई बहनों के बीच। जिसका अंखमुंदा पहले भर जाता था वो खुद को मुकेश अंबानी से कम नहीं समझता था!
सबसे मजा तो तब आता जब घर में कोई मेहमान आ जाते, उनकी वापसी का इंतज़ार होता क्योंकि जाते समय पैर छूने पर कुछ न कुछ मिलने की प्रबल संभावना होती थी, और वैसे में खुदरा कराकर अंखमुंदे को काफी हद तक भर लेने का बड़ा स्कोप भी! पर जब कुछ मेहमान बिना मुद्रा दिए निकल जाते तो उनपर बालमन आक्रोशित भी होता कि बड़े ही कंजूस निकले ये तो।
वैसे मेहमानों से मिले सारे पैसे आसानी से हमें ही नहीं मिलते, माँ तो जीएसटी काटकर छोटी राशि ही हमें पकड़ाती थीं पर उस रेजकी की खुशी भी कम न थी उस जमाने में। तिकोन तीन कीरिया, चौकोर पांच किरिया, गोल चवन्नी, अठन्नी और कागज के एक और पांच के नोट! पांच, दस से ज्यादा की हमारी औक़ात नहीं हुआ करती थी उस जमाने में! पर हम खुद को धन्ना सेठ समझा करते थे जब हमारा 'अंखमुंदा' भर जाता था।
शिवरात्रि का बेसब्री से इंतजार हुआ करता था क्योंकि शिवरात्रि के मेले में ही तो अंखमुंदे की खरीददारी होती थी! साइकिल पर आगे बैठकर कभी ब्लॉक में लगने वाले मेले, कभी कारिहार, तो कभी कहीं और। तब लकठो, चिनियाँ बादाम, मलाई बर्फ, बनबैर, जलेबी और 'अंखमुंदा' खरीदने का अवसर मिल पाता था।शिवरात्रि मेले के बाद से अंखमुंदे को भरने की कवायद शुरू हो जाती थी।
कभी-कभी सोचती कि माटी से बने इस गोलाकार वस्तु का नाम 'अंखमुंदा' क्यों पड़ा होगा? तो बालमन में यही जवाब सूझता कि इसकी आंख मूंदकर इसमें पड़े पैसों को हम नहीं देख पाते हैं, शायद इसीलिए इसे अंखमुंदा कहते हैं!
हर दौर में कुछ गड़बड़ झाला करने वाले लोग होते हैं। हमारे साथ भी बहुत बार ऐसा हुआ कि अंखमुंदा टूटे बगैर पैसे कम होने लगे। दरअसल मेटल के छोटे चिमटे की सहायता से एक आंख बंद करके एक एक कर के सिक्के निकाले जाने लगे! तब सिरहाने रखकर सोने लगी अपने चलते फिरते बैंक को!
दुखद स्थिति तो तो तब होती थी जब कभी लापरवाही से अंखमुदा टूट जाता और पैसे फर्श पर बिखर जाते । क्योंकि भर जाने पर तोड़ने का सुख कुछ और होता था।
अंखमुंदे को शहरी भाषा में '#गुल्लक' कहा जाता है। हम तो ठहरे ठेठ पलमूंवा, सो अभीओ 'अंखमुंदा' ही कहते हैं। हालांकि अब एकर दिन लद गया अब इसकी जगह ' पिग्गी बैंक' ने ले ली है। पर जो मजा 'अंखमुदे' में था वो पिग्गी बैंक में नहीं। फिर भी इसी बहाने घर के बड़े लोग बच्चों में बचत की आदत डालते हैं जो कि बहुत ही अच्छी आदत है ! जहां बच्चों के पास छोटी छोटी बचतों के संस्कार नहीं होंगे वहां अर्थव्यवस्था चाहे कितनी भी व्यस्क क्यों न हो भरभरा कर गिर सकती है!
हमारे लिए तो अब जीवन ही 'अंखमुंदा' है, जिसमें संग्रह हैं बहुत सी खट्टी-मिठ्ठी यादें और कटु-मधुर अनुभव जीवन के! जिन्हें एक आंख बंद करके नहीं वरन दोनों आंखे खोलकर देखना पड़ता है, क्योंकि यह बचपन का सुनहरा दौर नहीं, परिपक्वता की ऊंची दहलीज है।
नोट: अपने बच्चों में छोटे से ही बचत की आदत जरूर डालें और अंखमुंदे ( गुल्लक) से जुड़ी अपनी खट्टी मिठ्ठी यादें जरूर साझा करें
© शर्मिला
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