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आज के समय में बरात जाना स्टॉल पर चॉमिन खाने जइसन आसान हो गया है। गए मुँह चमकाए, फोटू घिंचवाये, खाये तो खाये, नई तो चल दिये। अगर लमहर प्रोग्राम रहल, तनिक दूर के, तो बारात जाए से पहिले हीं सब प्लान रेडी रखता है। रात में रुकना है कि राते में चल देना है, आपन गाड़ी से जाना है कि कउनो के साथ शेयरिंग करना है। फिर आगे के प्रोग्राम भी फिक्स रहता है, बस बारात जाना है, दुआर लगाना है, हाली-हाली भकोसना है और राते-बिराते चल देना है। केकरो से भेंट मुलाकात हालचाल के कोई हेडेके नहीं। इहाँ तक कि दुबारा दु दिन बाद अगर उहे जगह फिर से जाना पड़ जाए, तो आदमी भूला जाए कि कहाँ गए थे, कइसे गये थे।
पहिले ई सिस्टम हइये नहीं था। मने इहे समझिए कि बिना #मरजाद के बरात कोई मनबे नहीं करता था। इहाँ तक कि अगर कोई पहुना गाँव-घर में आने के बाद जल्दी निकल लिये, तो पुछल जाता था कि "काहे पहुना, जल्दी जाये लगली, मरजाद के व्यवस्था ना हलक का।"
अब होता का था कि पहिले बरात नजदीक जाये, चाहे दूर जाये, कम-से-कम दु टाईम खाना तो खियावेला पड़ता था। खाना मने खाना, ई कचौड़ी, जिलेबी आउर छोला भटूरा ना चलता। एकरा पहिलका आमदिन सब नास्ता मान ले, उहे बहुत है। अब बाराती के जईसन डिमांड रहे, ओकरे हिसाब से रात के कच्ची, न तो पक्की के इंतजाम रहता था। आदमी जाये पर नस्ता-उस्ता करता था, फिर रात में इत्मीनान से तान के खाता था आउ फिर भोर में बियाह होता था। तब तक बाकि आदमी सब, फर फ़्रेश हो के नदी-कुईयाँ-चापाकल जे व्यवस्था रहे, उहइं नहा के, तनी अगल-बग़ल घूम लेता था। केतना के हित-नाथ रहतन अगल बगल, तो उ सब उहऊँ तनिक हो लेता था। नस्ता पानी के बाद मजलिस बइठता - "सब के परिचय, थोड़ा हँसी ठिठोली, मर मज़ाक, किस्सा कहानी।" ओकर बाद एकदम निकले से पहिले बईठा के बजापते फुल भोजन करवाया जाता। अब रात के कच्ची रहे, तो दूसरे दिन पक्की, न तो एकर उल्टो। अब बाराती साइड के डिमांड पर दुनो टाईम कच्ची भी रह सकता था। लेकिन सराती सब चले घरी कहियो देता "अबकी दूनो टाईम कच्ची चलल, पक्की बाकिये बा।"
ई मरजाद के परथा भी सब जगहे अलग-अलग होता था। कहीं तो एक-दू दिन भी रोक लेता था सब। बाराती के स्वागत करे के एही तरीका था। तब आस-पास चर्चा का विषय भी रहता था और पूरा गाँव घर के सहयोग के बात भी रहता था। सब जगह चर्चा होता कि "जानईत हहुँ, फलना घर दु दिन बाराती मरजाद रुकल हलथि, बड़का घरे बेटा बियहउले हथी।" अभियो मगह इलाका में कहीं-कहीं बरात के मरजाद रखल जाता है। दु तीन बार हमरो मरजाद में रुके के मउका मिलल था। लेकिन अब तो कचहरी में हाज़िरी लगावे वाला सिस्टम है- आएँगे, खाएँगे, जाएँगे। अगर आपलोग का भी मरजाद का कोई अनुभव हो, तो कमेंट सेक्शन में लिख डालिये।
© आनन्द केशव

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