Monday, May 21, 2018

पलामू की यादें 1: दारूडीह कहाँ है भाई?

#पलामू_की_यादें 1: दारूडीह कहाँ है भाई?
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किस्सा बहुत पुराना है। सन 67 का। पचास बरिस पुरान। ओह साल के जनमल लईकन अब ला दादा-नाना अउर मईंयां सब दादी-नानी बन गए होंगे। उहे साल पलामू में भारी अकाल पड़ा था। पूछे से अभियो के इसकुलिया लइकन तुरंत बता देगा- "इहो नही जानते है? 67 में नहीं पड़ा था?"
खैर मेन किस्सा बताते हैं। उ अकाल में सरकार आदमी के जान बचावे ख़ातिर भारी रिलीफ का काम चलाया था। 'रिलीफ-वर्कर' गाँव-गाँव घुरल करते थे।फ्री किचन चलता था, माने मुफ़्ते में खाना खियावल जाता था। पिये का पानी आउ माल मवेसी ला चारा पानी सबका इंतजाम सरकार कइले था।
त उहे पिरियड का बात है, एगो बाहरी आदमी रिलीफ वर्कर बन के छावनी (लेस्लीगंज) से दरुडीह पैदले जा रहे थे। रास्ता तो कवनो से पता कर लिये थे मगर पहिले पहल था, उ भी अनजान जगह! नया आदमी कुछे दूर पहुँचा कि उसको एगो राही से भेंट हो गया। उ इधरे आ रहा था। रिलीफ वर्कर उससे पूछा कि भाई जी दरुडीह केतना दूर है?
"ढेरे तान बा का ?" कहते हुए आदमी आगे बढ़ गया।वर्कर बेचारा कुछ समझा नहीं ।
कुछे दूर गया होगा कि एगो जनाना मुड़ी पर दउरा लेले आ रही थी। वर्कर उससे पूछता है-
"बहनजी दरुडीह यहाँ से केतना दूर है?"
"आँय! आप कवन देश के हैं बाबु? बाहरी हैं का? हाँक भर बुझाता है?" बोलती हुई लेडी लेस्लीगंज तरफ बढ़ गयी।
रिलीफ वर्कर के पाले कुछवो नही पड़ा। उ तो मने मन डरियो गया था कि कौनो गलत सवाल तो नहीँ पूछा गया जे ई लेडी एतना सवाल कर गयी!
खैर आगे बढ़ते हुए कुछ दूर पहुँचा। उ आसपास दु चार गो खपरैल था। एगो जवान हाथ मे ट्रांजिस्टर लिए रेडियो सिलोन सुन रहा था-
"लगे वाला बतिया न बोल मोरे राजा हो, करेजा छुवेला"
एकदम फेमस गाना। रिलीफ वर्कर उसके नजदीक जा के पूछा कि भईया दरुडीह इहाँ से केतना दूर है?
"दूर है?" उ जवान तनी थिरकले बोला।
"उल्लू काहे बनाते है सर? आप खड़ा कहाँ है पहले ई तो बताइए? अउरो कौनो दरुडीह है का? आप रिलीफ कार्यकर्ता है का सर्?"
" हाँ भाई हाँ" कहते हुआ रिलीफ वर्कर आगे गांव की ओर बढ़ गया। अब उ समझ गया था कि दरुडीह पहुँच गया है। आउ सवाल सुनने का साहस उसमे नही बचा था। बेचारा अपना काम मे लग गया।
सवाल में सवाल का जवाब देने वाला ई ठेठ पलमुआ प्रसंग आपको कैसा लगा? बताइएगा जरूर!
हेल्थ परमिट करेगा तो हम #ठेठ_पलामू का पेज पर आकर जरूर मिलते रहेंगे। हमरा पास ढेर-मानी किस्सा कहानी है पलामू का। चलते रहेगा मौका पा के। मागिर जादे तगादा मत कीजिएगा। नमस्ते🙏
© Dhanendra Prawahi
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लेखक झारखंड के सुप्रसिद्ध एवं सम्मानित साहित्यकार हैं. हिन्दी, अंग्रेजी और नागपुरी भाषा में इनकी कई किताबें हैं, साथ ही देश की तमाम पत्र पत्रिकाओं में इनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं. अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा इन्होने पलामू में ही बिताया है इसीलिए पलामू की माटी से इन्हें गहरा लगाव है. ठेठ पलामू के विशेष आग्रह पर श्री प्रवाही जी अपनी आपबीती और अनुभवों को 'पलामू की यादें' नाम की श्रृंखला के रूप में लिखने के लिए तैयार हुए हैं, यह हमारे लिए गौरव की बात है. आपके रिस्पॉन्स का हमें और उन्हे भी बेसब्री से इंतजार है.
धनेन्द्र प्रवाही की अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिए उनके ब्लॉग www.prawahi.blogspot.in पर क्लिक करें.

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