Thursday, May 24, 2018

कहाँ खो गया मेरा गाँव

#ठेठ_पलामू : कहाँ गया मेरा गाँव?
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(अपने निश्चल गाँव की स्मृति में जीता एक भावुक मन की तरल अभिव्यक्ति. शायद सभी गांवों की नियति ऐसी ही हो गयी है.)

हे मेरे गाँव! हर पल मै तुम्हारी पुरानी स्मृति मे खोया रहता हूँ. आज की तुम्हारी स्थिति देखकर मेरे मन मे पीड़ा होती है. और, जब मै तुम्हारे पुराने स्वरूप का चित्र अपने मानस पटल पर अंकित करने की कोशिश करता हूं, तो मन कितना आह्लादित होता है उसका बयान भी मैं नहीं कर सकता.

आज शहर की अधकचरी संस्कृति के प्रदूषण ने तुम्हारी मिठास में जहर घोल दिया है. बम -बारूद के गोलों ने आज तुम्हारी सुगंधि को ग्रस लिया है. भाई-भाई की कटुता व वैमनस्य ने तुम्हारे रागात्मक सम्बंधों पर तुषारापात कर दिया है. जंगल उजड़ गए हैं, पेड़-पौधों का आस्तित्व ही समाप्त हो गया है. ढोल एवं मांदर की थाप पर थिरकते लय एवं ताल आज समाप्त हो गए हैं. रासायनिक खाद ने तुम्हारी   मिट्टी को ऊसर बना दिया है. आज ना तो कोयल की 'कुहू' सुनाई देती है और ना अन्य पक्षीयों का सुमधुर गान ही. वनांचल (झारखंड) प्रदेश में #गढ़वा जिले के मध्य में बसे तारे की तरह टिमटिमाने वाले हे मेरे छोटे से गांव #बघमार! आज मैं तुम्हारी दुर्दशा पर रो रहा हूँ.

आज से सवा सौ वर्ष पूर्व तुम प्राकृतिक रूप मे सजे-धजे थे. तुम्हारे आँगन में वनराज जैसे वन्य जीव किलकारी मारकर खेलते -कूदते थे. तुम्हारे 'उर्वर-ऊरू' प्रदेश पर निवास करनेवाले मनुष्य को वनवासी या आदिवासी कहा जाता था. वे उत्सवों पर हंसते -खेलते व ढोल मांदर की थाप पर नाचते गाते थे. पूरब की ओर कलकल-छलछल कर बहती '#बिरहा' नदी एक सीमा रेखा की तरह '#ओबरा' गांव से इस गांव को अलग करती थी. पास में ही एक शिवालय था, जिसमे प्रस्तर के अनगढ़े पशुपति विराजते थे, दक्षिण मे ग्राम आस्था के प्रतीक #डीहवार (ग्राम देवता) का स्थान था, जिनकी पूजा अगहन मास मे बैगा (पुजारी) #चेगना_बलि (मुर्गी का बच्चा), खंस्सी बलि एवं #तपावन (देशी शराब) आदि से किया करता था, जिसे '#गंवहेल_पुजाई' भी कहा जाता था.

ग्रामवासियों का विश्वास था कि गांव पर आनेवाली विपत्ति को डीहवार बाबा दूर करेंगे तथा उनकी पूजा से गाँव धन-धान्य से पूर्ण होगा तथा वे सबका भला करेंगे. अगर डीहवार कुपित होंगे, तरह-तरह की विपत्तियां आएँगी. गाँव के उत्तर में पहरेदारी करते छोटे-छोटे पहाड़ तथा #बारून (एक देहाती लकड़ी) का जंगल था. गाँव के पश्चिम में घनघोर जंगल एवं पहाड़ था. गाँव में समय -समय पर 'जितिया', 'कर्मा', 'सरहुल' आदि सामूहिक रूप से मनाया जाता था. देशी शराब पर्वों-उत्सवों पर पीने -पिलाने का रिवाज था.

गाँव मे महुआ, मकइ, तिल, कोदो, धान आदि की खेती होती थी. बस्ती एक जगह इकट्ठी नहीं थी. दूर-दूर पर मिट्टी खपड़े के बने हुए ईक्के-दुक्के घर दिखाई पड़ते थे. घरों मे लकड़ी के दरवाजे नहीं होते थे, बल्कि पशुओं से बचाव के लिए बांस की '#टाटी' लगाई जाती थी. मकई एवं धान की रखवाली खेत में मचान आदि बनाकर होती थी ताकि जंगली सुअर एवं सियार का फ़सलों पर आक्रमण ना हो. साज- सिंगार के लिए जंगली फूल एवं लताओं का उपयोग किया जाता था. बाल संवारने के लिए लोग लकड़ी के कंघी का इस्तेमाल करते थे. चटाई एवं पुआल इनके  बिछावन थे. सर्दी भगाने के लिए मोटी-मोटी लकड़ी के #अलाव जलाये जाते थे. जिसके चारों ओर बैठ कर सुबह -शाम सुख -दुख की बातें होती थी. कभी-कभी किस्से कहानियाँ भी हुआ करती थी.  कुछ टो-टा कर पढ़े-लिखे व्यक्तियों द्वारा '#सोरठी_बिरजाभार'  '#बीजय_कुँवरमल' जैसे पारम्परिक गीतात्मक काव्यों का पाठ भी होता था. कई स्मृति पंक्तियाँ अक्सर सुनने को मिल जाती-

'माथवा मूडवल हो जोगी चेलवा बनवल हो
विपत्ति मे होख न सहाय नू रे की ...'

'रामा हवेली कवेली दुई रे बहिनिया रे न.. रामा ..'
आदि.

तब ना तो धन संग्रह की ललक थी और ना ही हिस्से बखरे के लिए तकरार. तब गाँव मे शांति की देवी विराजती थी.

कहते हैं, 1880 मे हमारे पूर्वज इस गाँव मे आये थे, उनका नाम था-' लीलाधर मिश्रा'. उन्होने इस गाँव की जमींदारी ख़रीद ली और इसी गाँव मे रच बस गये. ग्राम्य-संस्कृति, रीति-रिवाज आदि मे गोत्र परिवार की तरह उनलोगों के साथ घुल मिल गए. 1908 मे छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम बना. 1914 से 18-19 तक गाँव का सर्वे हुआ. हमारे पूर्वज गाँव के जमींदार के रूप मे दर्ज किए गए. सर्वे के दरमियान 18 रैयतों का खाता बना, जिनमे कोरवा, मल्लाह, भुईयां, कहांर आदि खातेदार रैयत के रूप मे दर्ज किए गए.

तब भी गाँव मे कोई हर-हर कट-कट नहीं था. जमीन की लूट-छीन नहीं थी. पूराने समय से चली आ रही परम्परा एवं संस्कृति अक्षुण्ण थी. चोरी -डाके का कोई नाम तक नहीं जानता था. चौबिसो घंटे कोई कहीं भी निर्बाध रूप से आ जा सकता था. होली -दशहारे मे प्रेम एवँ भ्रातृत्व से लोग मिलते-जुलते थे. सभी लोग संपन्न थे और खुश भी. इसी तरह से समय सरकता गया.

फिर शुरू हो गयी आजादी की लड़ाई. देश-व्यापी राजनीतिक परिवर्तन का शोर सुनाई पड़ने लगा. लोग दूर -दूर से आकर इस इलाके में बसने लगे. इनके साथ ही आये घृणा, कटुता एवं संचय का वायरस गाँव में भी फैलने लगा. यहां की भोली जनता के सीधेपन का फ़ायदा उठाकर आगत अतिथियों ने शोषण प्रारंभ कर दिया.

फिर देश आजाद हुआ. जमीन छीनने-हड़पने का बाज़ार गर्म हो गया. गाँव में राजनीतिक आँधी चलने लगी. वोट की राजनीति ने अगड़ा, पिछड़ा, हरिजन, आदिवासी, शोषित दलित आदि की श्रेणी मे लोगों को बाँटना प्रारंभ कर दिया. इससे हमारा गाँव भी अछूता नहीं रहा. गाँव की संस्कृति, वेशभूषा एवँ भाषा में भी धीरे-धीरे परिवर्तन आना शुरू हो गया. प्रेम-भाईचारे का सम्बन्ध दरकना शुरू हो गया. ढोल और मांदर की जगह फिल्मों के अश्लील गानों ने अपना रंग जमाना शुरू कर दिया. जंगलों की बेतहाशा कटाई शुरू हो गयी.  गांव उग्रवाद का चारागाह बन गया. सूर्यास्त के बाद अगर कोई कहीं आता जाता भी, तो वह भी सहम कर. अब गाँव की कोमल घास या तो पुलिस के बूटों तले रौंदी जाती या उग्रवादियों के बंदूकों तले.

आज गाँव मे मेहनत और परिश्रम से कोई खेती करना नहीं चाहता, बल्कि हर कोई लूट-खसोट-धोखे  एवँ फरेब से अर्जित कमाई में विश्वास करता है.

पहाड़ के पत्थर की लगातार ढुलाई से और वृक्षों की निरंतर कटाई से पहाड़ के नाम का अस्थि पंजर ही बचा है. अब कोई डीहवार की पूजा नहीं करता. आज गाँव मे ना तो अलाव जलते है और ना उसके इर्द -गिर्द बैठ कर सुख -दुख की बातें ही होती हैं. अब सभी बातें करते हैं तो अपनी जाति के आस्तित्व की, वोट की राजनीति की व दूसरो को नीचा दिखाने की.

पूरब तरफ की कल कल करती बिरहा नदी खेत एवँ क्यारियों में परिणत हो गयी है. गाँव की कोमल कोकिला की आवाज और पक्षियों की चहचहाहट की जगह अब चील-कौओं एवँ सियार के स्वर सुनाई देते है. लगता है, गाँव में निवास करनेवाली शांति की देवी रूठ कर कहीं चली गयी है.

बार बार मेरा मन उस गाँव को खोजता है- जो कभी अपना था! जो शांति, प्रेम एवं भाईचारे की भावना से परिपूर्ण था, जिसकी मिट्टी की महक मीठी थी व जिसका नैसर्गिक मधुर संगीत था. पता नहीं कहाँ खो गया मेरा गाँव? क्या आपका भी गाँव...

© सतीश कुमार मिश्र
अधिवक्ता एवं साहित्यकार
गढ़वा जिला

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