Monday, May 21, 2018

गर्मी छुट्टी

#ठेठ_पलामू : गर्मी छुट्टी
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अप्रैल का महीना ख़तम होते ही हमारे स्कूल में गर्मी की छुट्टी शुरू हो जाती थी.
कितने बेसब्री से इंतज़ार करते थे इस छुट्टी का. फुवा के बच्चे हमारे घर आ जाते थे. एक दो दिन दोस्ती में गुजरते थे, फिर झगड़ा शुरू. ज्यादा गुस्सा तो तब आता था जब माँ उनको ज्यादा प्रेफरेंस देती थी.
बढ़िया बढ़िया खाना खाने को मिलता था. बगल वाले चाचा के पेड़ से आम का टिकोरा चुरा के लाते और खाते. आम का चोपि मुँह में लगने से घाव हो जाता था. जो बड़ा ही घिनौना दीखता था. दोपहर में माँ आमझोरा बनाती थी जो दाल भात के साथ सौन के खाने में बड़ी मजा. साथ में तिलौरी और चरौरी भी छनाता था.और गुडामा का डेस्सेर्ट, अहा!
जब दोपहर में सब बड़े सो जाते तो हम 'रेंगन-पार्टी' धीरे से उठ के उपद्रव शुरू करते. सबसे पहले फ्रीज खुलता. उसमे से रसना निकाल के 'पनसोसराइन' रसना का शरबत घोला जाता. आइस ट्रे से सारा बर्फ उसमे डाल के स्टील के गिलास में हम लइकन क्या मस्त पीते.
उ लहकत दुपराहिया में उ जोर से बहता हुआ लहर. उसमे हम कुवां तरफ' डोलहा-पाता' और पिट्टो खेल रहे होते. उ गर्मी में गाल अइसन लाल हो जाता कि लगता खून निकल जायेगा.
दादी के भाई उर्फ़ कंस मामा को भी परेशान करना हमरा मनपसंद गेम था. इतना जोर खर्राटा लेते थे कि पूरा गांव जान जाये कि ये सो रहे हैं. उनके नाक में सींक से खुजली कराना और उनका जोर जोर से छींकना. हाहाहा! उनका लाद इतना बाहर था कि हमको दौड़ा के पकड़ना उनके बस से बाहर का बात.
शाम को अगर कोई पहुना आये तो उसको फ्रूटी या पेप्सी दिया जाता. हम सब लइकन वहां बैठ के उ पहुना का तब तक मुँह ताकते जब तक उ खुदे ऑफर न कर दे कि- 'थोड़ा सा लो पी लो'. इ बात आउ है की उनके जाने के बाद माँ से बड़ी मार खाते.
शहरी बुआ का बेटा मैगी के पैकेट ले के आता था. वो खाने मिल जाये इसलिए उसका सब काम करते और सब बात में हाँ में हाँ मिलाते. मैगी को खाने के बाद प्लेट धोने की जरुरत नहीं पड़ती थी क्योंकि हम इतना उसको चाट ही लेते की वो वापस नया सा चमक उठता था.
फिर माँ मैंगो शेक बनाती. बहुत ही टेस्टी. शाम में लुका छिप्पी, लुड्डो और व्यापारी लालटेन जलाकर खेला जाता. माँ बाप को दिखाने के लिए बीस मिनट की पढाई भी करते जो बीस साल सा लगता.
फिर बैठते टीभी देखने. अलिफ़ लैला, तहकीकात, देख भाई देख और सुक शनिचर को फिल्म. आधा में लाइन चला जाता और हम इतना करुण पुकार भगवान् को लगाते कि हे भगवान काश लाइन आ जाये. पर उस क्रूर भगवान तक हमारी आवाज नहीं पहुँचती. थक हार के हम सोने आ जाते.
अंगना में लाइन से ६-७ खटिया लगता. ढाबा पर एक तरफ कूलर और एक तरफ ढब ढब बजे वाला टेबल पंखा. पारी-पारी से हम भाई बहन कूलर में पानी डालते. और जिस दिन जो पानी डाला उस दिन उसको कूलर के सबसे नजदीक सोने का सौभाग्य प्राप्त होता.
रात में सो के एकटक चाँद को निहारते हुए बड़े ही विनम्र शब्द में माँ को बोलते कि एक दिन हम चाँद पर जायेंगे. तब तक आजी का कर्कश आवाज आता - 'पढ़े लिखे ला साढ़े बाईस और सपना है चाँद पे जाने का'. रात को अपना जमीर जाग जाता कि कल से हम पढ़ेंगे. पूरा रुटीन मने मन तैयार करते जिसमे १३ घंटे पढाई और बाकि टाइम में सारा काम. फिर सुबह उठ के 'रात गई बात गई' वाली तर्ज पर हम सब भाई बहिन वापिस अड़वड़ करे में लग जाते.
अब तो गर्मी की छुट्टियां पता नहीं कैसे बीत जाती है!
© swetaanand mishra

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