#ठेठ_पलामू
बीसो यानि 14 अप्रैल यानि अम्बेडकर जयंती.
बीसो यानि 14 अप्रैल यानि अम्बेडकर जयंती.
बंगाली समाज का पोएला बैसाख.
आइए आज आपको पलामू और सत्तू के संबंध से परिचित कराएँ और सत्तू खाने के अलग अलग तौर तरीकों से भी रूबरू कराएँ.
पलामू सदियों से अकाल ग्रस्त क्षेत्र रहा है. भूगोल में आपने पढ़ा होगा कि वृष्टि छाया प्रदेश यानि पहाड़ के दूसरी ओर का एरिया. पहाड़ से टकरा कर बादल दूसरी ओर ही बरस जाते हैं, पलामू के पड़ोसी जिले हरे भरे और उपजाऊ हैं मगर पलामू की धरती बंजर.
लंबे अकाल का परिणाम है कोदो का भात और सत्तू.
ढेर गर्मी भी पड़ता है तो पेट ठंडा रखने के लिए भी सत्तू मशहूर हुआ. और आपलोग भी बताइए कुछ...
ढेर गर्मी भी पड़ता है तो पेट ठंडा रखने के लिए भी सत्तू मशहूर हुआ. और आपलोग भी बताइए कुछ...
खेसारी- जौ- बूट का सत्तू और पानी और नमक मिर्च प्याज. हो गया सबसे स्वादिष्ट व्यंजन तैयार. दिन भर की मजदूरी का जुगाड़.
एक गिलास सत्तू पीजिए नमक जीरा प्याज के साथ. लू से बचाव का बेहतरीन लोकल उपाय.
जौ गेंहू काटते टाइम अगर खेत मे बनिहार के परास के पतई में सत्तू सान के प्रेम से खाते देख ले तोह समझिये उस टाइम तोह 56 भोग खाना भी बेकार लगे.
वैसे भी कौनो बाहर के जिला से मेहमान आये तोह स्पेसल आग्रह कर के गोइठा वाला लिट्टी चोखा तोह बनिये जाता है सबे के घर मे.
सफर में भी लोग गमछा में सतूआ प्याज बांध के निकलते थे, रास्ते में नदी किनारे ब्रेक लगाते थे और मूड बनाते हुए भोजपुरी निर्गुण गाते हुए तल्लीन होकर सतूआ सानते थे. ये भी एगो कला है मरदे. आज कल के रेंगन को केतना पानी मिलाना है आउ केतना नीमक एकर आइडिया भी नहीं होता है.
और सबसे बढ़िया नास्ता-खाना, चाहे ट्रेन में कहूँ दूर जाना हो तोह फिर 'सतुआ भर के रोटी' जे की अंचार साथ भी खाये तोह परम आनंद. नही समझे! अरे उहे जेकरा आज सब सत्तू पराठा कहता है.
चीनी मिला के भी खा सकते हैं ,लड्डू बना के खा लीजिये बेसन और मोतीचूर फेल हो जाएगा एकर सामने.
तो अपने अपने बचपन की यादों में खो जाइये और न हो तो कचहरी पर जा के सत्तू दुकान से सतुआ लाइये आऊ मिजाज बना के खाइये.
[NOTE: अगर आप original पलामू के हैं तो जरूर शेयर करें. जो duplicate होगा वही नहीं करेगा.]
बीसो की हार्दिक शुभकामनाएं
🙏
~ आनंद केशव
पोलपोल, पलामू से.
पोलपोल, पलामू से.




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