#ठेठ_पलामू : नउआ आइल है का?
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सुबह सुबह उठ कर आईना देखे तो देखे कि बाल दाढ़ी बढ़ गया था. अब फुफेरा भाई के बारात में जाना है. मान लीजिए बड़का डढ़िया तोह फैशन में चलियो जाता लेकिन बलवा का का उपाय करें. गये सलून में. गाँव घर का सैलून था तबो नंबर सिस्टम से था, मने वेटिंग लिस्ट था. उ भी लमहर, दूर दूर तक कन्फर्म होने का कोई चांस नही दिख रहा था. ना ही तत्काल कोटा का उपाय.
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सुबह सुबह उठ कर आईना देखे तो देखे कि बाल दाढ़ी बढ़ गया था. अब फुफेरा भाई के बारात में जाना है. मान लीजिए बड़का डढ़िया तोह फैशन में चलियो जाता लेकिन बलवा का का उपाय करें. गये सलून में. गाँव घर का सैलून था तबो नंबर सिस्टम से था, मने वेटिंग लिस्ट था. उ भी लमहर, दूर दूर तक कन्फर्म होने का कोई चांस नही दिख रहा था. ना ही तत्काल कोटा का उपाय.
तभी दादा जी लोग का बताया कहानी याद आ गया. एक हमरे बड़का बाबा थे, मिजाज में पूरा पितगर. ठाकुर आया हुआ था घरे. बगल के परबाबा होंगे, मने उनके चाचा, अब उनका बाल काटा रहा था. वहीं पर बाबा आकर बोले कि अहो हमर बाल बना दे. अब बेचारा ठाकुर करे तो करे का? एक का पूरा बना ले तब न. छुरी कैंची बजाते हुए बोला कि - बाबा 10 मिनट रुकूं न! तुरंत बना देवाईत ही. बस इतना सुनते कूद दिए बगल वाला कुआं में. अब पूरा हल्ला! "निकलूं ऐ बाबा! हत्या लागाएब का! ई का गलती हो गइल!" फिर निकले और तब बाल बनवाये. पर यहां तो उहो ऑप्शन नजर नही आ रहा था.
एकर से लाख बढ़िया तो लइके टाइम रहता था. हर महीना के इतवार के ठाकुर घरे आते थे. उ जैसे ही बगल वाला घर पहुँचे, तबे से घरे एक बाल्टी पानी आउ बोरा बिछा के चाचा-पापा-बाबा और साथे घर भर के लइकन इतंजार में बैठ जाते. 5 -5 मिनट में जा जा के हमनी बगल वाला घर झांक के आते रहते थे कि अब कै गो बाकी बचा है? आने के बाद एकदम सीरियल नंबर से दादाजी से शुरू होता. और सबसे अंत तक लइकन का बारी आता. और समझ लीजिए कि जेतना लइकन है सब के बाल पकड़ पकड़ के कटवा दिए जाता उ भी एक ही स्टाइल में. जैसे आज सब धोनी और हनी सिंह वाला स्टाइल में रहता है वैसे ही हमनी फुल एरिया के लइकन लालू यादव के जबरदस्त फैन थे. मजबूरी भी था, इतना छोट बाल काटिये दिया जाता था कि केतनो तेल सोखैला पर भी 10-15 दिन तक बाल झडाने का सवाल ही नही था.
कहीं कहीं साप्ताहिक रूप से वही ठाकुर का इटलीयन(ईंट पर बैठ कर बाल कटाने वाला) सैलून भी लगता था जहाँ लंबी कतार. और गांव भर का नया पुरान न्यूज़ इन्ही पवित्र स्थलों पर रंग बिरंगे एंकर लोग से मिलता था. लइकन तो लइकन, उ समय खाली बड़ी लड़की लोग बाल नही कटवाती थी पर घरे का छोटकन बहिन लोग का भी वही स्टाइल में बाल काट दिया जाता था.
आउ एगो सीक्रेट बात बताये? हर गाँव मे 2-4 ठो पंडीजी और ठाकुर भी एके नाम के मिल जाएंगे. हमरो बाबूजी का जे नाम है ना उहे नाम के ठाकुर से बाल बनावैते बड़हन हुए है. अब आपलोग भी दिमाग मे जोर लगाइये और साथ मे गांव के पंडीजी का नाम ठाकुर (नउआ ) से मैच करवा के कमेंट करिये!
अगर गलती से कौनो गोतिया में टपक गए तो फिर बाल छिलवाने में जो प्रतिस्पर्धा लगता था पूछिये मत! 1-2 घंटा से बाल भीगा भीगा के आपन बारी आने के चक्कर मे न जाने केतना बार कपार सूख जाता था. और केतनो भीगाते कि छिलने टाइम कम चरचरराये पर का फायदा? उ उस्तरा केतनो रगड़ के पजाया हुआ हो चरचरइबे करता था. और नउआ के बहाना कि बढ़िया से फुलबे नही किया होगा! उ नैन झराझर छोलवाने का मजा आजकल के जिलेट वाला लइकन का जाने गा जी!
एक बार बाबा-दादा पास चर्चा तो छेड़िये, बहुते स्टोरी मिल जाएगा...

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