#ठेठ_पलामू :झुमेलवा
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जी.एल.ए. कॉलेज से बी.ए. पास करले दू बरिस बीत गइल रहे, दिन ब दिन कुछु काम-धाम करेके पारिवारिक प्रेशर बढ़त रहे. अब सरकारी नौकरी ला बइठ के केतना तइआरी करल जाव? आउ त आउ! बाबूजी आउ माई के छोड़ गाँव-गिराओ-गोतिया- परिवार सब एतना टोने मारे लगलन कि सुनत-सुनत कपार पाक गइल रहे. आउ उ छोटन चाचा तो हदे कर देले हलन! जब भी हमरा देखते हलन बस इहे बात बोलतन- “का रे बशिष्ठवा कुछ करबे धरबे ना का रे? तोहार बिआह शादी कइसे होइ हो...! इ सार दिन भर झुमेलवा तर बईठ के रमजनमवा के बेटवा साथे ओकर-चोकर छाँटत रहला“
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जी.एल.ए. कॉलेज से बी.ए. पास करले दू बरिस बीत गइल रहे, दिन ब दिन कुछु काम-धाम करेके पारिवारिक प्रेशर बढ़त रहे. अब सरकारी नौकरी ला बइठ के केतना तइआरी करल जाव? आउ त आउ! बाबूजी आउ माई के छोड़ गाँव-गिराओ-गोतिया- परिवार सब एतना टोने मारे लगलन कि सुनत-सुनत कपार पाक गइल रहे. आउ उ छोटन चाचा तो हदे कर देले हलन! जब भी हमरा देखते हलन बस इहे बात बोलतन- “का रे बशिष्ठवा कुछ करबे धरबे ना का रे? तोहार बिआह शादी कइसे होइ हो...! इ सार दिन भर झुमेलवा तर बईठ के रमजनमवा के बेटवा साथे ओकर-चोकर छाँटत रहला“
हम सुन के चुपचाप उहाँ से निकल जइती. नाम बिगाड़े में तो पलामू वालन गोल्ड मैडल लेले हथ, फट से नाम के टांग तोड़ दिहें.
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झुमेलवा हमार गाँव पालहे (पाटन) में एक प्रतिष्ठित महुआ का पेड़ बा, जे ग्रामीण सड़क के तीनमुहान पर स्थित बा. इ सदियों पहिले भी हमार पूरखों के सामने ठीक अइसने खडा हलक. एकर छांव में हमार बचपन बीतलक. इहंई धूल-मिट्टी में गिल्लीडंडा, गुंजमार लट्टू और गोबर-गीद जैसन खेल खेलते हुए हम बढ़न होली, तो हर सुख-दुःख में झुमेलवा के भी जोड़ेला लाज़मी हलक. गर्मी के मौसम हो और झुमेलवा तर चार गो खटिया ना पड़ल रहे ऐसा शायद ही संभव हो! गांव के कुछ बुजुर्ग़ जिनकर भीरु ख़ुदा के पास जाए के लिए वक़्त कम मगर खुद के लिए वक़्त के भरमार हलक, उसब देश-दुनिया के बात करते इहां देखल जइतन. एक बार तो झुमेलवा के फल(डोरी) और फुल(महुआ) चुने ला दू परिवार में तना-तनी भी हो गेलक. गांव में रामलीला दिखाने का कार्यक्रम हो, केकरो पूतोह सास-ससुर से बोले बिना नइहर चल गेल हो या फिर केकरो बेटा कौनो की लईकी को भगा कर ले गया हो सब के पंचयती उहंई होइतक.
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ढेरे कोशिश करेके बादो जब डाल्टनगंज में हमरा कउनो ढंग के काम ना मिलल, तो एक दिन अतिया के हमहू बाहरे जाएके ठान लेली. सोचली सार के कम से कम इ टोन मारे ओलन से तो पिंड छूटी. आउ जब तक कुछ ना करब तब तक हम एकिन के मुँह देखे ना आइब.
आउ फिर एक रोज माई-बाबूजी के गोड़ छू के निकल गेली. बाबूजी बोललन- "कहाँ जइबे बाबू? एतना अकबका के निकल गइले, रुकते दू चार रोज तो उधार पईंचा कर के हज़ार-पानसौ देतिव न! अभी तो इहे दू सौ हव, ल रख ल." फिर हम उन्हका ई कहइत विश्वास दिलउली कि उ पड़वामोड़ वला रमनथवा, जे हमरा साथे कौलेज में पढ़त रहे उ धनबाद में कुछ काम करला. ओकरे पास जाइब. बोलले बा कि काम मिल जाई उहां. तबले माई एगो झोला में सतुआ बांध के ले अइलन आऊ हमर बेगवा में डालके कहलन-" बेटा रास्ता में भूख लगी तो खा ली ह."
अब हम बेग पीठ पर टंगली आउ निकल गइली. झुमेलवा के पास से गुजरइत मन में होखल कि वापस घूम जइती! फिन जब उ टोन कसे ओलन के इयाद अइलक तो पांँव दबइली आउ सरपट पीच रोड तक पहुंच गइली.
टैम्पू से डालटेनगंज स्टेशन और उहां से ट्रेन पकड़ के धनबाद पहुंच गइली. बेचार रमनाथवा स्टेशन पर हमरा लेवे आइल रहे. उ हमरा आपन डेरा में ले गइलक. ओकरे डेरा में नहा-धोके खाना-पीना कइली.
"इयार रामनाथ! हमरो 12-15 हज़ार के नौकरी लगा दे भाई, बड़ी पेरशानी में हिव!"
रामनाथ बोललक : "अरे मरदे! हमार ऑफिस में कंप्यूटर ऑपरेटर के जगह खाली बा. तू कल बायोडाटा ले के चल जइह. हम बॉस भीरु तोरा ला सिफारिस कर देले ही."
"बस बस भाई! तू एतना कर देल इहे ढेरे बा! तू सच्चा इयार होये के हर फ़र्ज़ निभवले बड़. कल हम ऑफिस जा के मिल लेब."
भाई नौकरी तो मिल गइल डाटा एन्ट्री ऑपरेटर के, 12 हज़ार महीना पर. अउ हमहुँ उहई डेरा खोज के काम करे लगली. काम के व्यस्तता आउ छुट्टी के अभाव में 2 साल निकल गइलक. अब घर के बड़ी इयाद आवत रहे. माई-बाबूजी फोन पर बोलावत रहलन कि-"आ जो बेटा! बड़ी दिन हो गइल तोहरा देखले. गाँव में बड़ी कुछ बदल गइल बा. सरकार बड़ी चौड़ा रोड बनवावत बा! औकरे में आपन दू गो खेत चल गइल बा. तोहार बाबूजी से अब कुछु ना होइ. आ के हिसाब किताब समझ ल कि कइसे का होइ?" पर माई के इ बोलके कि आउ एक साल बाद आइब तब तक छोटकी बहिन के बिआह ला कुछ पइसो जमा हो जाई, बात के घुमा देली. अइसही काम करत-करत एक बरिश आउ बीत गइल. घर जायके मन अब आउ केतना मारल जाव.
आउ फिन एक दिन आव देखली न ताव, छोड़ के नौकरी चल देली आपन गांव. बस से उतरला के बाद गांव के सड़क पहचनात ना रहे! माई ठीक बोलले रहे, सच में रोड चौड़ा बन गइल रहे! मोरमवा वाला रोड अब पीच के बन गइल रहे. चलइत-चलइत कब घर आ गइल पता ना चलल.
अब घर के चउख़ट तक त पहुँच गइली, लेकिन मन के कुछ कचोटत रहे.
कि जइसे रस्ता में कुछ छुट गइल.
कि जइसे हमरा कुछ लूट गइल.
कि जइसे हमार बचपन गाड़ी के आवाज़ में खो गइल...
कि जइसे रस्ता में कुछ छुट गइल.
कि जइसे हमरा कुछ लूट गइल.
कि जइसे हमार बचपन गाड़ी के आवाज़ में खो गइल...
अचानक मन खनकलक! पीठ से बैग निकाल के चउखटे पर से ढाबा में फेंकली. आउ सरपट भाग के तीनमोहान पर पहुँचली. उहां जे देखली तो आँख से लोर अपने आप निकल गइल.
रोड के चौड़ाई में झुमेलवा दफ़न हो गइल!
झुमेलवा कट गइल?
झुमेलवा कट गइल!
झुमेलवा उहां से हट गइल...
झुमेलवा कट गइल?
झुमेलवा कट गइल!
झुमेलवा उहां से हट गइल...
© अवनीश प्रकाश

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