#ठेठ_पलामू : घोड़ नाच
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पहले दूल्हा घोड़ी पर बैठ कर आए या न आए लेकिन घोड़ नाच ले कर जरूर आता था!
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पहले दूल्हा घोड़ी पर बैठ कर आए या न आए लेकिन घोड़ नाच ले कर जरूर आता था!
हमारे यहां गांव में बरात के आगे आगे एक पुरुष घोड़े के पुतले को पहनकर नाचता था, इसे घोड़-नाच कहा जाता है. हम सब बच्चे खो जाते थे और उसके आस-पास नाचने लग जाते थे. फिर अगली सुबह हमारी मित्र मंडली पुआल और ररेठी से घोडा बना कर जो असल में होता नहीं था ठीक वैसा ही नाचने की कोशिश करते थे. वैसे ही जैसे बस से उतरने के बाद हम कुर्सी में उल्टे पैर लटकाए ड्राइवर बनने की कोशिश करते थे. मासूम बच्चे अक्सर आसपास की रमणीय चीज़ों और घटनाओं की नकल से बहुत कुछ सीखने की कोशिश करते हैं. वास्तविक शिक्षा का यही तरीका भी रहा है.
कल रात बिहारी भैया की बिटिया की शादी में अचानक से घोड़ नाच दिख गया तो वही बचपन और अपना गाँव का याराना याद आ गया. फिर क्या एक सेल्फी ले ली घोड़-नाच के साथ और खो गया नाच देखते देखते.
अब अगली बार जब भी घर में किसी की शादी होगी घोड़ नाच की व्यवस्था जरूर करूंगा,क्यूंकि बेहद खूबसूरत और मजेदार है ये और इस कला को बचाने की अवश्यकता है.
डी.जे की शोर में ये कहीं दब गया अब इन्हे बचाने और सरंक्षण देने का वक़्त आ गया है.
आप सब की तरह अच्छा लेखक नहीं हूँ इसलिए गलतीयों को नजरअंदाज कर दीजिएगा !
सिंधु सिंह.
बान्दुबार,पांकी
बान्दुबार,पांकी
विडियो क्रेडिट - आनंद केशव


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