Monday, May 21, 2018

माई बिन नईहर

#ठेठ_पलामू : माई बिन नईहर
---------------------------------------
बिलकुल भी घर नहीं जाने का मन नहीं हो रहा था उसका। अम्मा के बिना क्या नईहर!
कौन अँगना टटका गाय के गोबर से लीप कर इंतज़ार कर रहा होगा। न खीर बना होगा न दलही पूरी। अम्मा को ही रहता था कि बेटी ससुराल से आ रही है तो खीर-पूरी टोला-पड़ोसा में बाँटेंगे। इससे घर भरा रहेगा बेटी का।
मगर अब न अंगना लीपा होगा न, न तो खीर-पूरी बंटी होगी। दरवाज़े पर लोटा में पानी और आम का पल्लव भी नहीं रखा होगा किसी ने। उसी पर पहली नज़र जो बेटी कि पड़ती है तो बेटी जुड़ाई रहती है ससुराल में भी।
इसी सब उधेड़-बुन में लगी थी कि कार रुक गयी। लोर भरे नज़र उठा कर देखा तो उसका घर, उसका मायका आ चुका था।
आँचल की खूँट से आँसू पोंछा और खोईछा सम्भालते हुए उतरने लगी कि दरवाज़ा भाभी ने खोल दिया। एक हाथ में गुड़ का टुकड़ा और दूसरे में ठंडा पानी। मुँह में गुड़ डाल कर पानी पिलाया।
डबडबायी आँखें लिए दूरा से आँगन में घुसते हुए उसने देखा, बीच देहरी पर कलसा रखा हुआ था और आँगन गोबर से लीपा था। उसने भाभी का हाथ पकड़ लिया और गले लग कर रोने लगी।
"रो क्यूँ रही हैं दीदी। अम्मा हर जगह हैं। देखिए वहाँ कलसे में। उस देहरी पर रखे खीर-पूरी में। ये देखिए आपके लिए कल हरीयर चूड़ी लायें उसमें भी।" भाभी ने टेबल तरफ़ इशारा करते हुए कहा।
अब और फूट-फूट कर रोने लगी। रोते हुए भाभी की तरफ़ नज़र उठा कर देखा तो भाभी की नज़रों में उसे अम्मा मुस्कुराती नज़र आयी।
©Anu Roy

No comments:

Post a Comment