Monday, May 21, 2018

केतारी आऊ गुड़

#ठेठ_पलामू : केतारी आऊ गुड़
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एक समय अपने गांव में घुसते ही गुड़ की मीठी महक मिल जाती थी. मेरा गाँव किसी ज़माने में गुड़ का सबसे फेमस बजार हुआ करता था- "तरहसी". लेकिन अब सब गुड़ गोबर!
बचपन में गन्ना(केतारी) और ताजे गुड़ को चूसना- अब बहुत याद आता है. गुड़ के भट्टी में बनाए गए खूबसूरत झोपडी में खेलना, देर हो जाने पर मार खाना- ये रोज की आदत थीं.
आखिर ऐसा क्या हुआ कि अब वहां न तो गुड़ है न गन्ना. विकास तो हुआ लेकिन इमारतों का. विकास के नाम पर बिल्डिंगे दिखती हैं. लेकिन इंसान और खेत के बिना अगल बगल के गांव सुनसान दिखते हैं.
अमानत नदी भी सूखी रहती है यहां के चेहरों की तरह.
अब यहां के लोग दूसरे जगहों पर जा कऱ खेती कर रहें हैं लेकिन यहां नहीं! ख़ैर ये राजनितिक विषय हो जाएगा और ठेठ पलामू राजनीति की बिल्कुल इज़ाज़त नहीं देता इसीलिए चुप रहना उचित है इस पर.
अब ना तो गुड़ की शर्बत है, न गुड़ की चाय, न गुड़ की खीर, ना ही थाली में गुड़ जो डेजर्ट के नाम पर खाते थे. पराठों में भी गुड़ भरे होते थे, गुलगुला तो होटल से गायब ही हो गया है. तब बाबा बैलगाड़ी से लाते थे गुड़, अब पापा झोला में लाते हैं.
©अमित पांडेय
तरहसी, पलामू

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