Monday, May 21, 2018

पहिले वाला बाराती का खाना!

#ठेठ_पलामू :पहिले वाला बाराती का खाना! 
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का बतायें बाबू! आज कल तो बियाह लगन के मारा मारी चल रहा है. गाँव-गोतिया से लेके हित-नाथ तक सब घर जाना पड़ता है. न्योता हंकारी भी तो जरूरी है, मान लीजिए हम नहीं जाएंगे तो हमार घरे भी तो कोई नहीं आएगा!

मागिर आज कल के शादी मे ऊ मज़ा कहा रहा जो पहिले के बराती में होता था. का मजे के संपरते थे सब. दो सप्ताह पहले से ही तैयारी.

कोन गाँव जाना है जी बारात? वहाँ तो कटहल खूब होता है. मीट मसाला के भी व्यवस्था है का?

बाराती पहुंचा नहीं कि लोटा थाली ले के सराती पार्टी तैयार. पैर धोने के लिए. मोजा महकने के डर से कई लोग बाहर भाग जाते थे बहाना कर के.

फिर मिलता घड़ा के ठंडा पानी वाला बेल के शर्बत. फिर डिब्बा वाला नस्ता! नस्ता भी होता तो तरीका के. स्पेशल बनवाया हुआ निमकी, गाजा और उ वाला झीनिया सेब. अलगे से कोई फल का आइटम. मज़ा आ जाता था. हमलोग तो चक्कर में रहते कि मांग के एकात डीब्बा पैकेट आउ रख लिया जाए. फिर चुपके से ले के कोना मे निकल दिए या झोला में साज लिए.

फिर जनमासा में पानी और पैसा से सबके आज्ञा मंगाई होता. माने फ़र्स्ट नोटिस कि पेट पुजा के तैयारी के लिए. ई काम भी बड़ा संभाल के होता. कोई छूटे नहीं. खास कर परिवार के बुजुर्ग. ना तो उ सब के गोसा भी नाके पर रहता. कह देते कि - 'जा ना खाएंगे!' ओकर बाद होता बिजईया, माने फ़ाइनल न्योता खाने के लिए.

सब के जमीन पर कपड़ा-दरी बिछा के एके पांत में बैठाकर पत्तल दोना परोसा जाता. छोटका बच्चा सब पानी चलाता पूरा मन से. नहीं तो नीमक मिचाई.

'अरे लीजिए न! थोड़ा सा भात आऊ.'

'इहाँ तरकारी चलाओ जी, कने गया बाल्टी वाला?'

'ई लीजिए चटनी, स्पेशल है हमारे यहाँ का.'

' नहीं. लहसुन प्याज वाला नहीं है ई आइटम, अलग से बनवाए थे.'

'अरे! फूफा जी गुस्सा गए हैं, उसना भात बनवाओ हाली हाली. आऊ रुखरी रोटी भी सेंकने बोल देना.'

'हाँ. लेडीज लोग गीत गा गा के तिलौरी पारी है. सगूनौउत होता है न. लीजिए न! ई चिप्स आलू का, दु गो लीजिए महाराज, सुगर है तो का हुआ, खाइए चांप के. बेइज्जती कराइयेगा का हमरा गांव का.'

'घी चलाया जाए, अब आऊ आइटम नहीं है, रामरस भी चल गया, शुरू करा दें न? ओह अचार छुट गया, आ रहा है, दु मिनट रुकीएगा.'

'एतना आइटम हो गया कि पत्तल छोटा पड़ गया'

फिर चलता पापड़. माने कि अब परसन नहीं मिलेगा. लेडिज लोग गारी गा गा के खिलाती.

"भूखे पेटवा आया रे समधी, एतना पूड़ी खाया रे..
बीच पांत से लोटा ले के खेते खेत दौड़ाया रे.."

अब तो सब सिस्टम ही चेंज हो गया है. भिखारी जैसा हाथ में थारीया ले के लाइन में लगने वाला और मांग मांग के खाए वाला. खाने मे भी कइसन कइसन आइटम. सब गाँव मे, सब बारात में एके मैन्यू. सब गरिष्ठ गैस बाई वाला चीज़. चाट-चौमीन फूचका. नान पुलाव पनीर. न बनाने का ढंग ना ही खिलाने का सहूर.

ओकर बाद बिआह के मड़वा मे सब रस्म होता. इहां भी बहुत मज़ा आता. एक से एक ज्ञानी बुजुर्ग लोग महफिल जमाते और स्टार्ट होता सवाल जवाब और शास्त्रार्थ का चर्चा. ई पार्टी से ओकर बात कटाता तो ओने से एने पार्टी का. घंटो बहस चलता. ई मे लावा मेवा का ट्रे कई बार घूम जाता. गाँव के विद्वान लोग का इज्जत के बात हो जाता था न. हारने पर पूरा बाराती को मरजाद (मर्यादा) रख के भोरे फिर से खिलाना पड़ता था. ओ भी पूछ के - कच्ची की पक्की?

सच में, पहिले के बारात में मज़ा आ जाता था. पर अब ओइसन मज़ा कहाँ बारात में. ना तो खाए वाला वैसा ना ही खिलाने वाला. आधा बाराती को तो अब बोतल से मतलब रहता है, आधा को धुआँ से. और सच पूछिए तो केकरो पास ओतना टाईमो नहीं है.

अच्छा! गप करने में पता भी नहीं चला, आते हैं एगो reception का पार्टी में से नेम ढेम पूरा के-
"अजी सुनती हैं! ऊ लिफाफा दिजीएगा तो 51 रुपया डाल के..."

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Concept: श्री बलराम पाठक
Words: बालेन्दु शेखर पाण्डेय
Editing : सत्यान्वेषी स्वामी
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