#ठेठ_पलामू : पलामू के मरीज
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कोई भी बाहर का डाक्टर पलामू में आकर प्रैक्टिस नहीं कर सकता है.
क्यों?
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कोई भी बाहर का डाक्टर पलामू में आकर प्रैक्टिस नहीं कर सकता है.
क्यों?
क्योंकि पलामू के मरीज की बिमारी लोकल डाक्टर के अलावा कोई समझ ही नहीं सकता. गज़बे गज़ब डिक्शनरी है इहां तकलीफ के वर्णन के लिए. आइये कुछ नमूना पेश करते हैं -
"भीतरी से तुफान उठता"
"जुठकठार हो गेल बा"
"मिजाज कईसन तो लागत बा हो"
"पेटवा हड़हड़ात है जी"
"हाथ लकड़िया रहा है"
"ढोढी उसुक गईल बा"
"धुआईन ढेकार आवत बा"
"कानवा टस टस मारता है"
"मनवा भकुआईल लगत बा"
"कपरा उड़ उड़ जा रहा है"
"हाथवा गोड़वा झिनझिनाता है"
"सुतला पर उठा उठा के पटकत बा"
"अकबकी लागत बा"
" खड़जूड़ हो गया है"
"जुठकठार हो गेल बा"
"मिजाज कईसन तो लागत बा हो"
"पेटवा हड़हड़ात है जी"
"हाथ लकड़िया रहा है"
"ढोढी उसुक गईल बा"
"धुआईन ढेकार आवत बा"
"कानवा टस टस मारता है"
"मनवा भकुआईल लगत बा"
"कपरा उड़ उड़ जा रहा है"
"हाथवा गोड़वा झिनझिनाता है"
"सुतला पर उठा उठा के पटकत बा"
"अकबकी लागत बा"
" खड़जूड़ हो गया है"
अब ऐसा विवरण सुनकर अच्छे अच्छे को अपनी डिग्री पर शक हो जाता है कि कहीं ये चैप्टर छूट तो नहीं गया था. दुभाषिया से भी काम नहीं चलता.
तो क्या कहते हैं आपलोग? आपको भी कोई ऐसी तकलीफ हो तो नीचे कमेंट करें.

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