हम खाना बनाने के बहुत शौकीन हैं, इसलिए कहीं भी रहे किचन ढूंढ ही लेते है। देश मे तो छोड़िये विदेशो में मौका मिले तो बाज नही आते हैं।
पिछले साल ज़ाम्बिया (अफ़्रीका) में थे तो उहां देखे कि बहुत लोग अभीयो चारकोल मने ओहि बिना धुवाँ वाला लकड़ी का कोयला से चूल्हा जला रहा था। तभी हमारे मन में गांव का सिनेमा चलने लगा कि कैसे उ टाईम घरे घर चूल्हा जलना शुरू होता था बेर डूबते।
आज न सब के घर में गैस सिलेंडर हो गया है, पहिले तो सब घर माचीस भी नही होता था। कोई एक घर चूल्हा जोरा गया तो धुवाँ देख के आसपास के सब घर से लेडीज़ लोग ओकर घर #रसम लेने आती थी। रसम मने बूझे कि नहीं? चूल्हा जलाने के लिए जो आग जलाने का जुगाड़ होता था न उसी को रसम कहते हैं. अब सोचियेगा कि एक घर से रसम सब औरत कैसे ले जाती होगी? और सब लेइये जाती होगी तनीए तनी कर के, तो बांटे वाला घर का चूल्हे नहीं बिता जाएगा? सब जलावन नहीं सिरा जाएगा? तो होता ई था कि सब लेडिज लोग आपन घर से खपड़ा में कर के दू- दू ठो गोइठा लाती थे। एगो गोइठा बांटे वाला घर के चूल्हा में डाल दिये टैक्स के रुप में और दुसरका के उपर चूल्हा में से जरईत- सूलगइत गोइठा लेकर आपन घर रसम जोरे, दिया बाती करे चल जाती थी। अरे भाई ओतना किरोसिन तेल, माचिस आउ जलावन नहीं न रहता था सब भीर? आपसी सहयोग से पूरा गाँव का चूल्हा जलता था।
और मान लीजिए कि कौनो घर जल्दी धुआँ दिख गया और आपके घर अभी हुर-हार (मने सब्जी काटना, आटा सानना इत्यादि) भी नहीं हुआ है तो ताना-गारी-डांट सुनने के लिए रेडी रहिये। आइते के साथ ओने से मरदाना ठोंणा मारना शुरू कर देते कि- "तोहनी के हियाँ अभी गपे चलइत बा, हुआं फलनवा घर रसम जोरा गेलइ कखनिए से! का जन ईसब के बारह-बजिया खाना बनावे वाला आदत कब खत्म होइ?"
ई सिस्टम तनीए-मानी ही सही पर कोयला चूल्हा वाला जमाना तक चलता रहा था। पर जब से ई ससुरा गैस सिलेंडर आया है रसम माँगने वाला सिस्टमें खत्म हो गया!
खैर जाम्बिया मे देखे कि लोग अगरबत्ती से आग ले के एक घर से दूसरा घर जाते थे। हम भी एगो चूल्हा सुलगाने में लग गए। अपने खाना नहीं बनाते तो पता नहीं ई लोग हमको का खिला देता, शाकाहारी आदमी को कष्ट तनी मानी है ई घोर कलजुग में?
© Anand Keshaw
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