#ठेठ_पलामू :मेली दीदी का बियाह हो गया
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(पिछले भाग से आगे की कहानी...)
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(पिछले भाग से आगे की कहानी...)
एगो बड़का दोना में मिठाई भर के लावल गया. दीदी और जीजाजी दोनों को खिलाया गया.
जीजा कनखी निगाह से दीदी के मुँह देखे के कोशिश कर रहे थे. एक दिल्ली में रहने वाली मॉडर्न दीदी ने काकी को डांट लगा के दीदी के मुँह पर से चादर हटवाया. मेरी दीदी एकदम फक फक गोर थी, उसपे गहगहात नारंगी सिन्दूर से उसका चेहरा गजबे सूंदर हो उठा था. जिजवा के तो मानो भागे खुल गया था. मारे ख़ुशी में दू ठो एक्स्ट्रा रसगुल्ला उ मार लिहिन.
उ मॉडर्न दीदी हमलोग को डांट के कोहबर से निकाल दी और बोली कि दोनों बर कन्या के कुछ देर अकेले में बात करे दो. मन नहीं होते हुए भी हम वहाँ से निकले.
अभी दीदी-जीजा का प्रेम प्रसंग शुरू भी नहीं हुआ था कि काकी छाती पीट पीट के लगी घोलटने, "कैसे आपन बेटी के बिदाई करूँ हो दादा"! हम सोच में पड़ गए और माँ से पूछे कि माँ ये तो रोज सुबह-शाम दीदी को गाली दे के बोलती थी कि - "तोरा जल्दिये अरैठ लगाइब" फिर रो क्यों रही हैं? माँ ने अपने अंचरा से आंसू पोंछते हुए कहा कि तुम अभी नहीं समझोगी.
दीदी का भी कोहबर से रोने का आवाज सुनाई देने लगा. जीजा 'बिना मांगे पत्रिका की भाँती' बाहर आ के कुर्सी पे बैठ गए. हम लइकन लोग स्टैंड फैन के सामने खड़े थे, हमलोग को डांट के वहां से हटावल गया. नैका जीजा के डायरेक्ट पंखा के हवा लगे लगा. फिर उनकी शरारत देखने को मिली. मौका मिलते ही वो दीदी के सहेली से कुछ खुसुर फूसूर करने लगे आपन दांत निपोर निपोर के.
ओने कोहबर में दीदी जोर जोर से रो रही थी और उसी स्थिति में उसको तैयार किया जा रहा था. बगल वाली भाभी ने उनके सर पे दो मुठ्ठी केओ कार्पिन का तेल उढेल दिया. फिर खूब टाइट चोटी कर के उसमे डिज़ाइन वाला फीता बांधा गया. चढ़ावल गहना में से मांग टिका निकाल के मांग में लगा देवल गया. उ तो भला हो दिल्ली वाली दीदी का जिन्होंने कन्या को भारी कर्णफूल पहनावे से मना कर दिया वरना चार घंटा में दीदी का कान तो पक्का टूट के लटकीए जाता!
रोवत रोवत दीदी का नाक फूल के गोलगप्पा हो गया था. आवाज जा चुकी थी. उधर उनके भाई और बापू का भी इहे हाल था. जैसे तैसे दीदी के बनारसी साड़ी पहनावल गया.
दीदी ने कुरुसिया में सितारा गढ़ के बहुत ही सूंदर खोइचा तैयार किया था. उ खोइचा दीदी के कमर में लटका देवल गया. उसमे चाउर, गुड़ के भेलिया और सौ रूपया के नोट डालल था जो दीदी अपन ननद के देती.
रोवत दीदी को कार में बईठावल गया और करीब सौ मीटर के दूरी पे भाई लोग लोटा में पानी ले के खड़े हो गए. वहां पहुंच के दीदी ने कुल्ला किया. और भीगे आँखों से अपने भाइयों को देखा. उसकी आँखे मानो बोल रही थी - "भैया याद राखिह... ".
फूल से सजे कार में मेरी फूल से दीदी विदा हुई. उसने खुद को संभाला ही था कि एक गीत के बोल उसके कानो में गूंजे -
"खेलन गइली चाचा अंगनवा हो,
चाची बोलली बिरही बोल रे।
अंगना बीचे खड़ी थी गुमशुम,
बाजत रहे बिदाई के ढोल रे।
चाची बोलली बिरही बोल रे।
अंगना बीचे खड़ी थी गुमशुम,
बाजत रहे बिदाई के ढोल रे।
काहे काकी बोललु बिरही बोलिया,
छूट जइहें चाचा के देस रे।
छुटी जइहें आँगन तोहार अब तो,
बबूनी जइहें बिदेस रे..."
छूट जइहें चाचा के देस रे।
छुटी जइहें आँगन तोहार अब तो,
बबूनी जइहें बिदेस रे..."
दीदी को फिर से रोना आने लगा पर इस बार वो नहीं रोई, क्योंकि आंसू पोछने के लिए न तो माँ का आँचल था न बाप का गमछा! वो 'पगली बच्ची' तो शादी के दो घंटे बाद ही 'बड़ी औरत' हो चुकी थी जिसे सिर्फ खुद को ही नहीं एक परिवार को भी संभालना था!
(समाप्त)

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