Monday, May 21, 2018

मेली दीदी के बियाह में जलूल आना

#ठेठ_पलामू : मेली दीदी के बियाह में जलूल आना
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पियर रंग के गोटेदार लेहंगा पहिने थे हम जो थोड़ा उटांग हो चला था. पापा इसको परियार साल लाये थे लेकिन माँ गोदरेज में बंद कर के रख दी थी कि अभी ढेरे बड़ा है. अब वो छोटा हो चला था. जब खुद को आईना में देखा तो वो मासूम सी आँखें वापस मुझे ही निहार रही थी. ब्यॉयकट बाल, फुला-फुला सूंदर गोर गाल. उसपे क्लिप के बल पे हमने टैरा-टिका कॉपर में खोस रखा था. टह टह लाल लिपिस्टिक और रोल गोल के नथिया. मेकआप था तो थोड़ा फनी पर उसमे भी हम क्यूट ही लग रहे थे.
भैया चिल्लाया. "मइयाँ! जल्दी चल बरात आ गलौ."
चचेरी दीदी के बियाह था. बाहर मारे रवाइस छूट रहल था. एगो नया डिज़ाइन के बम पटाका मार्किट में आया था. फूटता तो उसमे दूल्हा के नाम लिखा जाता. हम मुँह खोल के देखत रह गए. बड़ा अमीर घरे बहिन के बियाह हो रहा है भाई!
दूल्हा धानी रंग के चमचम करत सूट और एक्शन के जूता में था. हमर तो जीजा जी लगे न! सब औरत लोग काकी के साथ दूल्हा के परीछे में लाग गयीं. दूल्हा के नजर न लगे इसलिए काजर गाल तक लगा देवल गया. अब तो डायन के बाप का भी नजर नहीं लग सकता था. दूल्हा खुदे पिचाश जइसन जो देखाने लगे थे. हम धीरे से जीजाजी के बगल में जा के खड़ा हो गए. हमारी उम्र यही कोई 11-12 साल रही होगी. न तो रेंगा के केटेगरी में ना ही जवान के केटेगरी में. खैर भला हो हमारे मेकअप का कि जीजा ने पास बुला के नाम पुछा आउ स्कूल का भी नाम पुछा. भाई 'सेक्रेड हार्ट' स्कूल में पढ़ते थे सो स्कूल का नाम थोड़ा जोर से ही बताये.
नास्ता खाना के बाद बियाह के रसम शुरू हुआ. बगल वाली भाभी को हाथ में माइक पकड़ा देवल गया. गीत गाये में उ हमर गांव में सबसे एक्सपर्ट थी. उ गीत के कुछ बोल हमको ईयाद है -
"एने के पंडित के
बेद बांचे आवला,
पुराण बांचे आवला।
ओने के पंडित के
माई रखे आवला
बहिन रखे आवला..."
हे भगवान! गाली गलौज के बीच बियाह चल ही रहा था कि बाहर में मार हो गया. कुछ बाराती लइकन दारू के निशा में एने के लइकन के कुछ बोल दिए थे. खैर! रेड़मा के बारात था तो बाराती को मार खाना लाजमी ही था.
सिन्दूर पड़े के बाद गहना चढ़ने लगा. सब औरत लोग रेस में, लगा कि एक के ऊपर एक गिर पड़ेंगी! सब को देखना था कि केतना गहना चढ़ रहा है. मांग-ढकी लुगा प्योर बनारसी है या मिक्स वाला? गहना पर्याप्त मात्रा में चढ़ा था पर जइसन कि रिवाज है, लइका वाला इसके लिया जरूर गारी सुनता है! सो भरपूर शिकायत गारी का रस्म पूरा किया गया. काकी एतना जोर से गरियाई कि नैका जीजाजी भी सुन लिए. सिन्दूर बहुराई साड़ी जो कन्या के बड़ी बहिन के मिलता है, का तो ऊ भी ख़राबे लाया था लइका वाला.
उधर नैका जीजाजी भी मने मन गोसा गाये. जब कोहबर में दूल्हा दुल्हिन को लावल गया और काकी जीजा जी से मौर मांगी तो उन्होंने सच में मौर देने से इंकार कर दिया. उनको समझावल गया कि गुस्साने का केवल "रिवाज" है, सच में नहीं गुस्साना है, पर ऊ सच में गुस्सा चुके थे. बोले कि न तो ढंग का चैन मिला ना तो घडी. काफी स्वाह-ब्वाह के बाद जीजा माने और काकी के गोद में अपन मौर उतार के दे दिहिन.
(क्रमशः...)

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