Monday, May 21, 2018

पलामू के विशेष रीति रिवाज

#ठेठ_पलामू : पलामू के विशेष रीति रिवाज
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आज वर्गवाद एवं जातिवाद का विष ऐसा फैल रहा है कि कुछ तत्व सामाजिक संरचना को कमजोर करने में सक्रिय एवं कुछ हद तक सफल भी दिखाई पड़ रहे हैं। किंतु पलामू के रीति-रिवाज को गौर से देखें तो ज्ञात होता है कि ये रिवाज हमारे समाज में प्रेम कायम रखने एवं समाज मे समरसता को अक्षुण्ण रखने में भी कम सशक्त नही हैं। समाज के विभिन्न अंगों और जातिगत विभागों का योगदान अलग अलग रस्मों में देखा जा सकता है। आगे कुछ जातिसूचक शब्दों का प्रयोग हमारे समाज में उनके महत्व और अभिन्न योगदान को दर्शाने के लिए किया गया है। एक अनुरोध है कि कृपया इसे सकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए, इसे अन्यथा नहीं लिया जाए।
1. किसी भी जाति के परिवार में जब किसी बच्चे का जन्म होना है तब प्रसूता के साथ महाराइन ही देख रेख के लिए रखी जाती है। वह किसी कुशल नर्स की तरह प्रसूता और नवजात शिशु की देखरेख एवं सहायता करती है। महाराइन के साथ बहुत ही प्रेम और आदर का भाव रखा जाता है।
2. जब किसी घर मे विवाह होता है इस अवसर पर मण्डपछादन के लकड़ी की व्यवस्था हमारे हरिजन भाइयों के द्वारा ही होती है। स्त्रियों की मंडली जाकर लकड़ी लाने वाले व्यक्ति के पीठ की पूजा पूज्य-सामग्री से यथा अरिपन (चावल का चूर्ण), सिंदूर आदि से करती है।
3. स्त्रीयां मंगल गान के साथ विवाह में ढोल की पूजा अक्षत, सिंदूर आदि से करती हैं।
4. इस मांगलिक अवसर पर बढ़ई-कुम्हार जैसे पौनियो का भी सहयोग अनिवार्य होता है। माली के द्वारा प्रदत्त मौर के बिना तो सौंदर्य प्रसाधन अधूरा ही रहता है। यह परम अनिवार्य प्रसाधन है।
5. उपर्युक्त मांगलिक कार्यों के अलावा अंत्योष्टि (प्राणी के शवदाह) में डोम जाति के बंधुओं द्वारा ही अग्नि देने का प्रवधान है। ठाकुर बाल बनाकर हमें शुचिता प्रदान करते हैं तो दशगात्र के दिन धोबी से स्पर्श करवा कर ही घर-बार इत्यादि पवित्र करवाया जाता है। इस प्रकार जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत समाज के हर वर्ग से सम्पर्क बनाया जाता रहा है।
6. धार्मिक व्यवहार में होलिका दहन के पश्चात पलामू के राजा मेदिनी राय की स्मृति में गुणगान किया जाता है। इस गान को 'उधवा' कहा जाता है। धूलि वंदन के दिन भस्म स्पर्श अनिवार्य होता है क्योंकि शास्त्र में इसे पवित्र माना गया है।
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आइए अब कुछ व्रत त्योहारों और रिवाजों की बात करें जो पलामू की जीवनशैली का अभिन्न अंग हैं।
परिवार में सुख, शांति, प्रेम एवं आनन्द बना रहे इस हेतु स्त्रियां अपने भाई के लिए भईया-दूज एवं करमा का व्रत करती हैं। हमारी माताएँ बहनें पति की लंबी आयु के लिए हरतालिका और वट-सावित्री अनिवार्य रूप से मनाती हैं तो पुत्र के लिए जीवित-पुत्रिका जैसे कठिन व्रत करती हैं। अपने पितृवर्ग को तृप्त करने के लिए पितृपक्ष में घर-घर मे पितरो देवताओं एवम पक्षियों तथा सृष्टि के सभी प्राणियों को जल अर्पित किया जाता है। यह पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण होता है।
पलामू में अभ्यागतों के सत्कार के लिए भी कुछ विशिष्ट विधान हैं। अतिथि के आते ही अभिवादन के पश्चात उनका पाद-प्रक्षालन विशिष्ट पात्र में किया जाता है। आयुर्वेदिक वैज्ञानिक अनुसंधान से यह पता चलता है कि इस क्रिया से उनके पेट की गर्मी अधोमुखी होकर निकल जाती है, शरीर का तापमान स्थिर होता है और इस कारण यात्रा से अर्जित थकान का ह्रास हो जाता है। तत्पश्चात उन्हे कुछ द्रव रूपी सामग्री परोसी जाती है। अब कुछ द्रव्य भेंटकर और लोटा में जल भरकर उनसे भोजन के लिए आज्ञा मांगी जाती है। फिर उनकी रुचि के अनुसार ही भोजन की व्यवस्था की जाती है।
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खैर आज के लिए इतना ही क्योंकि आज मेरी स्मृति और शारीरिक क्षमता ने इतना ही साथ दिया! शेष पुनः संयोग होने पर! #ठेठ_पलामू का प्रयास बहुत सराहनीय है, इस अभियान की सफलता के लिए कोटि कोटि शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद!
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©श्री राम चन्द्र पाण्डेय जी
पोलपोल, पलामू
सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य
उम्र 83 वर्ष
हिन्दी साहित्य, संस्कृत, अध्यात्म और शास्त्रीय संगीत के विद्वान.

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