#ठेठ_पलामू
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पलामू की कुछ कलाएँ/कल्चर विलुप्त हो रहीं हैं, कुछ आज याद आ गये अचानक..
1. भेंट कढ़ाने की कला:
यह मनोहारी दृश्य अक्सर मेला, रेलवे स्टेशन पर देखने को मिलता था, जब बियाही औरत अपने किसी नइहर वालों को देखती थी तो दौड़ कर रोने लगती थी. वो भी लंबे आलाप के साथ. गीत के नए नए प्रयोग और भाव भंगिमाओं की अद्भुत क्षमता का ऐसा प्रदर्शन अन्यत्र नहीं मिल सकता.
आंसू आए न आए आवाज रोने का निकालना ही पड़ता था. आप तो आज के spoken और यो यो वाले युग से हैं, घर में फूआ-दादी से पूछिएगा आनंद आएगा।
आंसू आए न आए आवाज रोने का निकालना ही पड़ता था. आप तो आज के spoken और यो यो वाले युग से हैं, घर में फूआ-दादी से पूछिएगा आनंद आएगा।
2.लोटा ले कर जाने की प्रथा:
किसी के घर मड़वा, तिलक बराती में बूलाहटा पर खाने वाले लोग अपना लोटा-जल ले कर जाते थे। इसे तो डिस्पोसल ने गायब ही कर दिया एक दम।
3. हलुवा भूंजना:
मेहमान को तो अब कोई हलुवा भूंज कर खिलाता ही नहीं है. मोहन भोग का नाम सुना है? इसे देहात में सोनपापड़ी ने और शहर में मिठाई ने गायब कर दिया. चाय ने तो बेल के शर्बत और कितने ही तरह के ग्रामीण mocktail ड्रिंक्स को दफन कर दिया साथ ही कई तरह के पकवानों को भी निगल गयी जिसमे आटा गुड़ का भुजा हुआ हलवा भी एक पीड़ित/ मृतक आत्मा है. भाई कोई तो इसके परिजनों को मुआवजा दिलाने के लिए आंदोलन करो! ढेरे कमाई होगा जी, कमिशन भी... विद्या कसम!
"सन्नी शुक्ला"

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