Monday, May 21, 2018

ऊ जमाना के पूतोह

जब हमार माई बियाह के बाद नया नया बहुरिया बन के घर मे आइल रहे त ओकरा पलामू के ठेठ बोली के चलते बड़ी दिक्कत होइल रहे। ओकरे याद कर करके अभियो उ रोमांचित हो जाएलआ।
पहले जब बाबा-आजी के जमाना रहे, उ समय घरे के #सवांग (व्यक्ति) के खियावे-पिवाये ला बड़ी सजग रहेला पड़त रहे घर के पूतोह के। उ समय पूरा आंगन आउर ढाबा गोबर से रोजे लिपात रहे। तब बाबा और बाउजी ओरिन के बिजेइया होत रहे, आउर जब बिजइया हो जइतक आउ फिर खाना परोसे में थोडहुन सा लेट होइतक त बाबा रूस जइतन, और पीढ़ा पर से उठ जइतन, आउ फिर आजी माई के नैहर के लोग के गरिया गरिया के ओएछन लागित! माई-चाची के हिम्मत नाही रहे कि प्रतिकार में आजी के कुछु कहित। आज के बहुरिया पता नहीं ओकर जबाब में उस समय के आजी के का करतन।
फिर शुरू होइतक मान मन्नवल! माई जाके बाबा-आजी से माफी मांगित कि गरमा-गरम खाना देवे में तनि दो चार मिनट के लेट होइलक। अब से ओहु लेट नहीं होई, बस अबकी बार माफी दे दिहुँ। बात इ रहे कि खाना निकाल के पहले से रखल बा तो खाना सेरा जइतक, आउ गरम-गरम के चक्कर मे थोड़ा भी परोसे में लेट होइतक तो माई ओरिन के सामत आ जइतक। फिर बाबा तबे मनतन जब उनकरे पसंद के और डिमांड के नया प्रकार के खाना परोसल जइतक। सच तो एहू रहे कि जब खाना में नया और पसिन्दा खाना खाएला रहत रहे तो बाबा और घरे के सवांग सब रूस जात रहन, चाहे बहाना कुछुओ लगाके।
पर एतना के बाद भी जब फिर नया पसंदीदा खाना बाबा के परोसल जाइत तब माई गावँ के गमहेल अउर देवता के मन मनावत रहित कि अबरी उ खाना जरूर खा लें। और उनका खइला बाद ही माई के जान मे जान होइतक। तब देवता-पीतर के धन्यवाद दे के तब जाके उ सबसे अंतिम में मुंह मे कुछुओ पानी डालित। इ रहे उ जमाना के पुतोह के लक्षण।
उ घरी के कुछ पलमूआ शब्द भी माई के ढेरे आफत करइत रहे।
एक दिन के बात है कि आजी हमर माई के कहलक कि बनिहार के '#लुकमा' दे द। अब हमार माइ भइल परेशान। खोजे लागल लुकमा। सगरो खोजत खोजत परेशान भइल। लुकमा मिलबे नइ करे। तब आजी हल्ला करे लागल। माइ के नइहर के परिक्षे लागल। तब छोटकी आजी पूछलन कि लुकमवा काहे नएखु देवत? माई कहलक कि इ लुकमा का बा जे मिलते नइखे? तब छोटकी आजी बतइलन कि बनिहार के सतुआ दे द। दूपहरिया टाइम के खाना लुकमा कहाला। साथ ही उ हंसते हंसते #कलेवा के मरम भी बता देलक कि उल्टी बेरा बनिहार के जे खाना भेजल जाला, ओकरा कलेवा कहल जा ला। तब जाके माई के सांस धसल। रोजे नया नया अनुभव से पारंगत होत रहे माइ।
अइसेहिं एक दिन माई घर के #पटवट पर सर सफाई खातिर चढ़ल। उहाँ के हालत देख के दंग रह गइल कि इहाँ के लोग सब #बउराह हथीन का? खाली माटी जमा करके रखले हथिन? बड़ी हिम्मत करके माइ आजी भीर उ मटिया के लेके गेलक पूछे ला कि एकरा फेंकवा के साफ कर दिहुँ का? जब आजी देखलक तो ओकर उ दिन मन कुछ ठीक रहे, तबो में माई के बाप-माई लगा के गरियावे लागल आउ हंसते हंसते कहलक की इ #लाह बा हो मउगो! जे बड़ी दाम में बेचा ला! इ तोरा माटी लागत बा? तब माई के आपन सामान्य ज्ञान पर तरस लगलक। और फिर से नया जानकारी के लिए आपन सास से गारी सुने ला मने-मन तैयार होते हुए माई आगे के 'काम-धानहा' मे लाग गइल।
©Dinesh Kumar Shukla
चौरा, लेस्लीगंज


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