Monday, May 21, 2018

माटी लगा के नहाये हैं कभी?

#ठेठ_पलामू : माटी लगा के नहाये हैं कभी?
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आज घरे से बाज़ार जाने के लिए जैसे ही निकले तो माई बोली- 'तनी शैम्पू और साबुन ले ले अइहे.'
हमहुँ दोकान में पहुँचे तो बोल दिए कि साबुन-शैम्पू दीजियेगा.
दुकानदार पूछा - कौन साबुन कौन शैम्पू?
'अरे जा ई तो पुछबे न किये!'
दुकान में देखे तो लाल पियर हरियर रंग के न जाने केतना शैम्पू लटकल था और साबुन समझिये वैसे ही.
तबे दिमाग मे आया कि अच्छा एकरा से त ढेर बढ़िया पुरनका जमाना रहता था.
हाँ! हमलोग के बचपन तक साबुन ही था ज्यादातर, शैम्पू आया था नया नया लक्स का. उस वक्त साबून मने लाइफबॉय और लक्स और सर्फ मने निरमा. जी हां! तब हर डिटर्जेंट पाउडर को सर्फ ही कहते थे.
लेकिन ओकर से पहले भी तो कुछ रहा होगा? पहले भी तो आदमी नहाता धोता होगा? मोहन जोदड़ो और हड़प्पा में एतना बड़ा बड़ा स्नानागार काहे बना था? बुढ़िया लोग का केश एतना सनपपड़ी टाइप से कैसे चमकता था? नइकी कनेया का लगा के बाल धोती थी कि एतना सोन्ह सोन्ह महकता था? ऊ जमाना में साबुन शैम्पू के जगह पर का था?
था न माटी! साबून भी माटी शैम्पू भी माटी! और हाँ ई कंडीशनर भी मटिये.
अब माटी मने का? ई बद माटी थोड़े रहता था जी! पूरा गांव बीचे या 2-4 गो गांव मिला के एकाध जगह का माटी फेमस हो जाता था. पूरा एरिया का जनाना मर्दाना सब का डिमांड - ओहि माटी.
अब कहीं नदी आहरा पोखरा में मिल गया तब तोह ठीक. लेकिन कहीं गलतीयो से केकरो खेत के माटी फेमस हो गया न तो खैर नहीं! बेचारा के केतनो पहरेदारी के बाद भी ओकर खेत के मिट्टी चोरी होइबे करता.
जौन दिन दादी के 'मूड़ मईसे' ला रहता, राते में मटिया के कटोरी में फुला देते थी. आउ हमीनो साथे साथे शौक से नहाते माटी से रगड़ रगड़ के. कसम से मिजाज परपन हो जाता था. आऊ ई dove साबून वाला शिकायत भी नही रहता था कि नहैएला के बाद भी चठ चठ करईत बा.
अब तो मन करने लगा नहाने का. गर्मी भी तो है! जाते है माटी का जुगाड़ करने. का पता कहीँ मिलेगा कि नहीं कुछ साल बाद? बाबा कह रहे हैं कि अब माटी भी शुद्ध कहाँ रहा? सगरों खाद और दवाई और गन्दगी वाला माटी है.
चलबे का हो? खुरपी ले लिए हैँ. लगा लेते हैं माटी. काहे कि जिस गति से कटाव-झड़ाव हो रहा है न, बाद में न माटी बचेगा ना ही बाल!
आपलोग भी अबकी घरे आइयेगा तो एकबार ट्राई जरूर करियेगा.

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