आज कल के छोरा छोरी
घर बैठ के करे चाकरी
फैशन के चक्कर मे
कूल दिखे की चाहत में
नामाकूल बन जावत है
कनहुँ दाढ़ी बाल मुड़ावे
तन ढंके कि बदन उघारे
फ़िल्टर से मेकअप चढ़ावे
छोरा भी नाक भौंह छिदवावे
लड़का लड़की दिखै के चाहे
लड़की के बुशर्ट पैंट ही भावे
रोटी-कपड़ा-मकान!!! तीनों ही किसी भी इंसान के सरवाईवल से जुड़े होते हैं। खाना इंसान के लिए जीवन-मृत्यु का प्रश्न है, तो सिर ढकने के लिए मकान की भी उतनी ही जरुरत है, उसके बाद सभ्यता के पावदान चढ़ते इंसानों को कपड़े कि आवश्यकता एक गंभीर विषय बन जाती है। जानवर होते तो कोई टेंशन ही नहीं था कपड़ा का। हालाकिं कुछ बुद्धिजीवियों को जो ओवरएक्टिंग में कुत्ते-बिल्लीयों को भी महंगे स्वेटर-जैकेट पहना कर, अपने आप को फैशनबुल कहलाने कि ख्वाहिश रखने वाले श्रद्धालुओं को छोड़ दिया जाये। पशु-पक्षी-जलचर व्यर्थ के कपड़ो औऱ फैशन के स्यापे से दूर ही रहते हैं, ठंड से बचने के लिए प्रकृति ने उनके लिए अलग व्यवस्था की हुयी है।
बहरहाल हम पशु-पंछी नहीं हैं, उनसे बेहतर भी नहीं हैं, पर हमलोगों ने अपने सभ्य होने का सूचक कपड़ों औऱ फैशन को बना रखा है। इतना ज्यादा मायने रखता है कपड़ों का प्रकार, पहनने का तरीका कि हम कभी भी चूकते नहीं प्रथम दृष्टया कपड़े-जूतों-आभूषण के आधार पर लोगों को तौलना औऱ कटघरे में खड़ा कर देना। अरबों खरबों का खेला बन चुकी फैशन इंडस्ट्री के "Haute couture" से अलग "pret -a-porter" आम मनुष्यों का पहनावा काफ़ी अलग है।
वैसे किसी भी प्रदेश के लोगों की स्टाइल प्रक्रिया पर वहाँ की फिल्मों, उनके नायक, नायिका, खेल जगत के सितारे, राजनीतिक रहनुमा, और युवा संगीत बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका में रहते हैं। 90 के दशक में गोविंदा ने मिक्स और मैच फैशन को बढ़ावा दे, एक नया ट्रेंड सेट किया था। इससे प्रेरित हो कर ही जिसको जो भाये, वही पहने वाला स्टाइल ज्यादा शिद्दत से समाज में पच सका था। नहीं तो दफ़्तर के लिए सादे / चेक-चेक बुशर्ट, प्लीट वाले पैंट, औरतों के लिए सलीके वाली साड़ी, लड़कियों के लिए स्कूल कॉलेज में एकहरी कर के दोनों कंधों पर पिन की हुयी ओढ़नी, सलवार औऱ a-लाइन टुनिक वाली समीज; यही चलती थी। 90 के सिनेमाई युग के रंगारंग मिज़ाज़ ने इस बोरियत को तोड़, लोगों को आज़ादी दी अपने पर्सनल स्टाइल के साथ ज्यादा एक्सपेरिमेंट करने की।
पलामू की बच्चियों का पहनावा झबला फ्रॉक से गुजरता हुआ ट्यूनिक स्कर्ट, सलवार फ्रॉक, परेलल, प्लाज़ो, शरारा, गरारा, लाचा, जीन्स टॉप, मिडी, स्कर्ट, शॉर्ट्स, हेम लाइन की कतरनी बनाते जाने कहाँ तक पहुंच गया है। रेडीमेड कपड़ों के बहुतेरे दूकान हैं शहर में, लेकिन हमलोग बचपन से ही हमीदगंज वाले 'टेलर चचा' के सिले वस्त्र ही पहनते थे। वो बात अलग है की बाद में लम्बाई-चौड़ाई के अनुपात से मगज़मारी करना उनको नागवार गुजरने लगा, तो उन्होंने खुद ही मातेश्वरी को सलाह दे डाली कि बिटिया को खरीद के फ्रॉक स्कर्ट क्यूँ नहीं पहनाती और अपने पाँव पर हमने खुद ही कुल्हाड़ी दे मारी, क्यूंकि हमारा जलवा अपने स्कूल, आसपड़ोस औऱ रिश्तेदारों में किसी छोटे मोटे फैशन influencer से कम नहीं था।
अब बात करते हैं प्रिंट्स की.. बॉबी प्रिंट, फूल पत्ती, बूटी के प्रिंट से तो सब वाकिफ होंगे की कहाँ से इनका उदगम हुआ। हमारे ज़माने के कार्टून प्रिंट जैसे की मोगली, डकटेल्स, टॉम-जेरी, दानु दानासुर, ऐलिस, सिनडरेला इत्यादि जैकेट, टीशर्ट में शोभायमान होते थे. फिर बुतरू से बबुनी और बबुआ, फिर 'बड़े हो चुके हैं हम' बोलने वाली स्टेज तक, हम लोग मिक्स एंड मैच में ही विश्वास करने लगे। कॉलेज में जिसका जन्मदिन उसी की तरह संवर के आना है वाला ट्रेंड था। मेरे जन्मदिन वाले दिन जीन्स, ढीला-कुर्ता, बंडी औऱ साथ में हैंडलूम झोला सहपाठियों औऱ शिक्षिकाओं के पास देख के आँख कइसे डबडबा जाता था, क्या कहें!
कौन सा ट्रेंड कहाँ से प्रभावित है, उस साल कौन सा रंग चर्चा में बना रहेगा, ये सब शोध का विषय है। साल डेढ़ साल में सब बदल जाता है। घर की आतंरिक सज्जा, स्त्री पुरुषों, बच्चों के परिधान, फुट-वियर, रंग, घर के आंतरिक साजसज्जा सबका पूर्वनुमान लगाया जाता है। जहाँ हस्तकरघा, हस्तकला उद्योग विलुप्त होने के कगार पर पहुँच चुके थे, sustainable फैशन के बहाने अब सब फिर से प्रमुखता से दैदीप्यमान होने लगे हैं। कशीदाकारी में पंजाब की फुल्कारी वाली ओढ़नी, लख़नवी चिकनकारी, बंगाली कांथा, बिहारी सूजनी, नवाबी ज़रदोज़ी; सबके उत्कृष्टता को टापते हुए मशीन के कार्य छाते चले गए हैं। इसमें किसी को क्या दोष दें, शायद वक़्त की मार ही कहेंगे।
झारखण्ड के मूलवासी, आदिवासी, अरण्यगामी जीवनशैली के तहत तन ढकने के लिए फूल, पत्ते, गाँछ, पेड़ों के तने, शिकार किये जानवरों के खाल से उदभव एवं विकास की डोर थामे सिमडेगा के मोटे सूती करघा में बुने कपड़े, लाल पाड़ वाली सूती साड़ी, दिलचस्प सिर के पहनावे, कोरी धोती मुरैठा, गमछा, कुर्ता से अब ब्रांडेड कपड़ों तक आ चुके हैं। 'Johargram' इस दिशा में बेहद सराहनीय कार्य कर रहा है। हाल ही में झारखण्ड की एक मॉडल माँ ने बेतरा में अपने बच्चे को बिठा रैंप वाक कर काफी सुर्खियाँ बटोरी थी। वक़्त ऐसे ही "stereotype" तोड़ने और परंपराओं को संशोधन कर फैशन को अपनाने का है। क्यूंकि दैनिक जीवन में "आप रूप भोजन, पर रूप श्रृंगार" यही नियम है।
कमेंट बॉक्स में अपने ऐसे किसी फैशन प्रयोग-यादों, बातों, मुलाक़ातों की जानकारी अवश्य दें। ठेठ पलामू के ट्रेंड स्पॉट वाली नज़रें ढूंढ़ रहीं हैं आपको।
आर्टिकल एवं स्केच: Shivangi Shaily
( लेखिका NIFT में प्राध्यापिका हैं और फैशन उद्योग से एक दशक से ज्यादा वक्त से जुड़ी हैं )
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