बार-बार झुका कर स्कूटर को, पापा का किक मारना और गुस्से से बुदबुदाना, फिर प्लग निकाल कर तार से प्लग साफ करना, रोड पर प्लग रगड़ना, फिर से अनवरत किक मारने की प्रक्रिया। स्कूटर का कसम खा लेना कि आज तो स्टार्ट ही नहीं होना है। और मेरा रास्ते के किनारे खड़े होकर इंतज़ार करते रहना और आंखें बंद कर प्रार्थना करना- "प्लीज् भगवान, अब और बेइजत्ती नहीं करवाइये। सब रास्ते से पार होने वाले लोग मुझे ही घूर रहे हैं, हंस रहे होंगे सब मुझपे। अभी गोलू भी पार होगा इधर से ही अपने पापा की कार से स्कूल जाने के लिए, देख लिया उसने तो जीना मुहाल कर देगा क्लास में।"
भुलाय नहीं भूलती वो स्लेटी रंग की 'बजाज चेतक' स्कूटर, जो वक़्त के साथ सिर्फ धूसर रंग की दिखने लगी थी। पता नहीं कितने दशक से मेरे घर का अभिन्न हिस्सा थी। वो सिर्फ पापा की सवारी ही नहीं थी, वो उनकी पहचान थी, उनकी शान थी। मेन रोड से ही उसकी तीखी हॉर्न की आवाज से हम सब घर में जान जाते कि पापा आ रहे हैं, फिर तो जैसे सारी मस्ती धरी की धरी रह जाती और पापा हमेशा हम बच्चों को घर आने पर पूरी तन्मयता से पढ़ते हुए ही पाते।
मोहल्ले का कोई ऐसा व्यक्ति नहीं होगा, जिसने गाहे बेगाहे जरूरत के वक़्त उस स्कूटर की सवारी नहीं किया होगा। उस वक़्त मोहल्ले में नाम मात्र की गाड़ी हुआ करती थी (जी आप बिल्कुल सही समझे, हम पलमुवा लोग आज भी two wheeler को गाड़ी ही कहते हैं), तो किसी का बेटा बीमार हो या किसी की माँ, पापा कभी भी अपनी स्कूटर देने में नहीं हिचकते थे। जरूरत पर तो उस नामुराद(प्यारी) स्कूटर के कारण पापा रात में भी मोहल्ले के लोगों की सेवा में लगे रहते थे। हम घर वाले किचकिचा रहे होते थे, लेकिन पापा को एक अलग सुकून का अहसास मिलता था अपनी रामप्यारी की धौंस जमाने में। स्कूटर ना होकर एक पुष्पक विमान ही था जैसे वो, कितने भी लोग हों, सब उस स्कूटर में एडजस्ट हो जाते थे।
समय बदला। पहले स्कूटी लिया, फिर सैलरी बढ़ने पर लोन से दुल्हन सी सुन्दर कार लिया। पब्लिक ट्रांसपोर्ट तो जैसे बंद ही हो गयी। चौबीसो घंटे A/C में रहने की आदत सी पड़ गयी, अब तो कार की खिड़की जरा सी नीचे हुई नहीं कि डस्ट एलर्जी जान निकाल देती है। पर आज भी वो सुकून और खुशी नहीं मिलती, जो पापा की स्कूटर में पीछे बैठ कर मिलती थी। सीटबेल्ट और एयर-बैग्स भी वो सुरक्षा का एहसास नहीं दे सकते, जो पापा के स्कूटर में आगे खड़ा हो कर कहीं जाने में होती थी।
मेरी प्यारी सवारी तो भाई लोग पापा की खटारा स्कूटर ही रहने वाली है। आप भी अपनी घर की पहली स्कूटर या मोटरसाईकिल से जुड़ी याद जरूर से शेयर करें।
आर्टिकल: Shivangi Shaily
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