Monday, February 27, 2023

घर का चिप्स, पापड़, अचार

 पलामू में त जाड़ गया नहीं कि गर्मी बरसे लगता है। बसंत फसन्त के कल्चरे नहीं रखे हैं हम लोग आपन यहां। साल-शूटर उतरा नहीं कि डाइरेक्टे पंखा कूलर चालू।

जाड़ के मौसम जइते घाम बोले तो रऊदा बड़ी तेज होये लगता है। आऊ एकरे फायदा उठाके घर की माताएं लगे हांथ चिप्स, पापड़ आऊ सुखौटा बनावे में लग जाती है। वइसे तो सबसे बढ़िया लगता है आलू के चिप्स(उपरे से चाट मसाला छिड़क के बड़हन डूभा से भर के कबो सकार सकते हैं), पर अब नयका दौर में केला, शकरकंद, सूजी, साबुदाना आउ चावल के पापड़ और चिप्स भी बनने लगा है। बहुत से घरों में होली के पहले से ही महिलाएं लग जाती हैं चिप्स, पापड़ बनाने में या फिर होली खतम होत बड़का-बड़का आलू आ जाता है और फिर पसेरी के पसेरी आलू किनाये लगता है।
हालांकि संयुक्त परिवार की समाप्ति और ऑनलाइन मार्केटिंग और नयी महिलाओं की आलसीपन ने इस परंपरा को खासा प्रभावित किया है। अब महिला के वश की बात नहीं कि दैनिक कार्य निबटाकर वो चिप्स, पापड़ भी बना ले। और जब ऑनलाइन घर तक ये प्रोडक्ट आ ही जाते हैं तो कोई भला मेहनत क्यों करना चाहे! पर हमारी पीढी ऐसी पीढ़ी रही जिसने चिठ्ठी भी देखी, लैंडलाइन फोन देखा, स्मार्टफोन देखा, घर में अचार, पापड़, चिप्स और मसाले बनते देखा। हमने लेदरा का सुख भी अनुभव किया, तोसक पर भी सोए और कर्ल ऑन गद्दे भी देखे। हमारी पीढ़ी के बच्चे अपनी मांओं के साथ गर्मी की शुरुआत में अहले सुबह उठकर चिप्स, पापड़, अचार बनाने में उनका हाथ बंटाते थे, उसके बाद स्कूल जाते थे।
घाम होने से पहले ही बाध वाला खटिया घामा में लग जाता, ओकरा पे सूती वाला पातर साड़ी चाहे ओढ़नी बिछा के ओकरे पर चिप्स पसारल जाता था। सबसे मशक्कत था आलू छिलके पानी में डालना आऊ फिर पतला-पतला सांचे में काटना। जितना पतला चिप्स कटता उतना ही बजरूआ दिखता, एकदम कागज जैसा, भकभक उजर! चिप्स काटने के बाद भी चैन नहीं था फिर ओकरा खौलत पानी में डालके तुरंत निकाल के सूप में छानना पड़ता था ताकि पानी गर जाए। नमक, फिटकरी आऊ लालमिर्च वाला इ पानी चिप्स के स्वाद और सुंदरता बढ़ा देता था। फिर पानी निथार के एकरा घामा में खटिया पर डालना होता और पलटना भी पड़ता ताकि दूनो बगल सूख जाए। बढ़िया घाम रहला पर दू तीन दिन में सुखा के एकरा हवा बंद डिब्बा में रखना होता आऊ खिचड़ी के साथे, चाहे पहुना अइला पर चाय के साथे एकरा परोसल जाता था।
कभी सब्जी एके गो रहे तो दालभात पर भी चिप्स छान के खाना के स्वाद बढ़ा देवल जाता था। ससुराल में रहे वलन बेटी को भी माताएं ये सब भेजा करती थीं! एतना पर भी घर के लेडीज लोग कहां मानती थी, फिर आलू, साबुदाना, सूजी, तिल, मसूर, उड़द, चावल के पापड़ भी बनता। ओकरो में पूरा मेहनत था । साबुदाना के गलाके ओकरा चिकन प्लास्टिक पर चम्मच से डालना होता था, फिर दोनों बगल पलट के सुखाया जाता, तब डिब्बे में रखल जाता था। साबुदाना वाला पपड़वा के एगो खास बात था कि गर्म तेल में जइते इ अपन साइज से एकदमे दुगुना-चौगुना बड़ा हो जाता है। थोड़ा बड़ा तो आलू के चिप्स आउ तिलौरी, चरौरी भी होता लेकिन इ त एकदमे आपन आकार बदल देता है, बड़ी बढ़िया लगता था इ सब देख के!
बाजार से चाहे ऑनलाइन मार्केट से केतनो मंगाकर चिप्स, पापड़, अचार खा लें पर घर के बने चिप्स, अचार, पापड़, अदौड़ी की तो बात ही निराली है । इ जो आजकल के बचवन Lays-कुरकुरे के नाम से अगज-बगज मसाला लपेटल चिप्स खाता है न, एकरा से स्वाद में तनको कम नहीं था हमर जमाना के आलू चिप्स। हमनी एकबार में एक एक प्लेट चिप्स अइसहीं खा जाते, आजकल के बचवन जइसन नहीं कि दस, बीस रूपया में आधा हवा भरल चिप्स के पैकेट में ही संतोष करेला पड़े।
बेशक आज की माताएं ज्यादातर कामकाजी हैं, पर जरा भी समय मिले तो एक दो किलो आलू का ही सही, थोड़े से चावल का ही सही घर का चिप्स, पापड़, अचार बनाकर पुरानी परंपरा और अपने हाथों के प्यार को अवश्य जिंदा रखें। चिप्स, पापड़, अचार, सुखौटा, अदौड़ी को लेकर अपनी पुरानी यादें अवश्य शेयर करें।
आर्टिकल एवं तस्वीर: शर्मिला शुमी
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू
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