सौ-दू-सौ तो छोड़िए, पाँच-सौ हजार भी पॉकिट में रहे तो गरीब जैसा लगते रहता है, पॉकेट बहुत हल्का महसूस होता है, जबकि एक वक़्त था, जब सौ का एक नोट पास में रहने पर लगता था कि इतना पइसा कहाँ खर्च करेंगे। सौ का तो बात ही छोड़िए, दस का नोट होने पर भी जेब गरु लगने लगता था। सौ रुपया यदि किसी के पास होता तो, महीना भर का पॉकिट खर्च का टेन्शन दूर हो जाता था। आखिर कोई कितना खर्च करता? होटल में दो-चार आने से अधिक की न कोई मिठाई आती थी और ना ही नमकीन।
कभी-कभी तो हालत ऐसी हो जाती थी कि सौ के नोट से छोटे दुकानों में सामान खरीदना मुश्किल हो जाता था। दुकानदार यह कह कर सामान देने से मना कर देता था कि सौ का भंजाना मुश्किल है बाबू। सौ का नोट रहता जेब में, लेकिन पान खाना या चाय पीना भी मुश्किल हो जाता था।
अब सौ के नोट का यह वजन, जिनकी उम्र पचीस-तीस की है, उन्हें समझने में कठिनाई हो रही होगी, पर अब यह स्वप्न जैसा लगता है। उस समय किसी साधारण आदमी के पास सौ का नोट होना ही बहुत बड़ी बात थी। आखिर तब चलन में सौ का नोट ही सबसे बड़ा नोट था। लोग सौ का नोट जल्दी तोड़ना नहीं चाहते थे, इसलिए कि इसके बाद कुछ और मद में खर्च न हो जाय। कुछ लोग तो ऐसे भी थे कि यदि घर में नमक खत्म हो गया, तो पड़ोसी से मांग कर काम चला लेते या कहीं से पईंचा ले लेते, पर सौ का नोट तुड़वा कर नमक नहीं खरीदते। 99 रुपया रहता, तो इस जुगत में रहते कि कैसे एक रुपया और जोड़ कर सौ का नोट बना लें और बक्सा में रख कर ताला लगा दें। शायद इसी प्रवृति के कारण ही "निन्यानवे का फेर" मुहावरा अस्तित्व में आया होगा।
जब कभी कोई किसी को सौ का नोट देता, तो बार-बार याद दिलाता "बढ़िया से देख ल, सौ के नोट हव"। यदि बच्चों के द्वारा कहीं सौ का नोट भेजना होता, तो न जाने कितनी बार चेतावनी दी जाती कि ठीक से रख लो, कहीं गिरा मत देना। नहीं तो बच्चे की जेब में रखकर, जेब में आलपिन भी लगा दिया जाता, ताकि गिरने का कोई खतरा ही न रहे।
आज भले सौ रुपया में एक वक्त का मनपसंद खाना न मिले, पर तब सौ रुपये में किसी अच्छे होटल में महीना भर खाया जा सकता था। सौ रुपये में घर में दो नौकर रखे जा सकते थे। सौ रुपये में दो-तीन जोड़ी ब्रांडेड जूते खरीदे जा सकते थे। दुकान का सबसे कीमती कपड़ा भी सौ रुपया में खरीदा जा सकता था।
कितना बखान करूँ, तब के सौ रुपये के नोट का!!! काश, आज भी सौ रुपये के नोट की इतनी ही मूल्य होती, सही मायने में भारत सोने की चिड़िया बन जाता। बजट तो देखे ही होंगे, सरकार और नोट छापेगी अपना घाटा पूरा करने के लिए। नोट का वजन और कम होते जाएगा। आपकी बचत से ज्यादा तेजी से महंगाई डायन भागेगी, यही हम सबों की किस्मत है।
लेखक: Sunny Shukla Rohan
( पिताजी से बजट चर्चा पर आधारित )
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