Tuesday, February 7, 2023

" चारछिया चूल्हा "

जाड़ा का आनंद गांव में ही आता है, जहां देखो सुबह- शाम लोग आग जलाए बैठे मिल जाएंगे। ये वो मौसम होता है जब धन कट के, दवा- मिसा के घर में अा चुका होता है। नए चावल का माड़- भात तो सभी ने सुना होगा लेकिन ये शायद किसी ने सोचा होगा की चावल बनता कैसे गई धान से। अरवा और उसना चावल पसंद करने वाले लोगों के बीच व्यंग। कोई कहता है अरवा में सुगर ज्यादा होता है तो कोई कहता है ऊसना चावल उष्ठ लगता है।
अरवा बोले तो धान को एक घाम सूखा के कुटवा देना। अरवा चावला का माड़- भात कभी अच्छा नहीं लगता और उसना चावल वो होता है जब धान को रात भर पानी में भिगो के रखते है और फिर बड़े - बड़े हांडी, चेरी या टिन्न में डाल कर आग पर चढ़ा देते है और उसमें भाप आने के बाद उसको उतार देते है। ये बहुत ही मेहनत का काम है, फिर उतरे हुए चावल को 8-10 दिन के लिए छाया वाली जगह पसार देते हैं। लास्ट में एक दिन धूप में सुखाया जाता है और फिर कुट्वा देते है । इन सब के बीच सबसे ज्यादा उपयोग में आता है चरछिया चूल्हा !!
चाराछीय चूल्हा बोले तो वैसा चूल्हा जिसके चार मुंह होते है और एक ही एंट्रेंस होता है । चराछीय चूल्हा माने जड़ा का अंत , इतनी गर्मी होती है इसमें आस - पास 15-20 लोग भी आराम से बैठ जाए। भूसा या कर्कटी डाल डाल कर इसको जलात्ते हैं साथ ही साथ इसमें आलू भी पक्का लेते है , नहाने के लिए पानी गरम कर लेते है और तो और धान का लावा भी निकला लेते है इसके भूसी की आग से। ये है तो बहुत पुरानी चीज लेकिन ब्लास्ट फर्नेस से कम भी नहीं है और जिसने भी आविष्कार किया होगा कितना कमाल का दिमाग लगाया है, एक बार में चार टीन उस्ना जाता है। हमारे घर में चराछीया चूल्हा अभी भी दादी ही बनती है। सुबह के तीन बजे ही दादी चूल्हा जोर के धान चढ़ा देती और बाबा बैठ कर भूसा झोकते।
नई- नई कनिया बहुरिया को कहा पसंद होता है धान उसनना ?? दादी के साथ ही सोना होता था मेरा , और जब वो तीन बजे उठती थी मैं भी उठ जाती थी साथ में दादी - बाबा की नोकझोक सुनना... बहुत मज़ा आता था। ये दादी बाबा के साथ बेस्ट मेमोरीज में से है।
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आर्टिकल और तस्वीर: रिया
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू
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