Tuesday, February 21, 2023

अगुआ

 अगुआ, मतलब बेटी की शादी के लिए लड़के वाले के घर आने वाले मेहमान। आज भी अगुआई की प्रथा प्रचलित है, पर अब यह बीस-तीस साल पहले की तरह नहीं होता। तब न तो आवागमन के इतने साधन थे और न ही तेज गति से संचार के साधन। यदि बेटी की शादी करनी है, तो न जाने लड़के की खोज में पिता के कितने जोड़ी जूते घिस जाते थे। इस अगुवाई के पहले पिता, अपने पुराने सगे संबंधियों या इष्ट मित्रों से अपने बेटी के लिए योग्य वर का पता करते थे। अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त कर उस लड़के के घर जाते थे। साथ में वह व्यक्ति भी होता था, जिसने पता बताया हो या उस लड़के वाले के घर से परिचित हों। साथ ही एक दो ऐसे व्यक्ति भी साथ होते, जो शादी व्याह तय कराने के एक्सपर्ट माने जाते थे। इस प्रकार चार पाँच लोगों की टोली कभी लड़के के घर वालों को सूचना दे कर या कभी-कभी अचानक निकल पड़ती थी, अगुवाई के लिए।

अगर सूचना है, तो लड़के वाले हैसियत के अनुसार थोड़ी बहुत तैयारी कर लेते थे, जैसे घर में चीनी, आटा, घी आदि मंगा कर रखा जाता। बिछावन वगैरह की साफ सफाई या व्यवस्था, दरवाजे की लिपाई इत्यादि काम कर लिए जाते थे। पर मुश्किल थोड़ी बढ़ जाती थी, जब अगुआ बिना सूचना अचानक धमक पड़ते थे। घर की औरतें कुछ ज्यादा ही परेशानी महसूस करने लगती थीं, तब जब घर पर कोई मर्द उपस्थित नहीं होते। वे पड़ोस से किसी युवा या बच्चे को बुला कर उन्हें बैठाने का प्रबंध करवाती और शर्बत-पानी का इंतजाम करती। शर्बत के लिए नीबू न होने पर जीरा या सौंफ पीस कर डाल दिया जाता। फिर बारी आती नास्ता का, तो सबसे बेहतर माना जाता था आटा का हलवा जिसे मोहनभोग भी कहा जाता है। फिर हलवा के लिए जितने लोग, उतनी तस्तरी का इन्तजाम। यदि कम पड़ा तो फिर पड़ोसी के यहाँ से मंगवाना, उसी पड़ोस के लड़के से। तब तक मर्द भी खेत खलिहान से घर पहुँच ही जाते थे। फिर हलवा की तस्तरी में आम के अचार के साथ दालमोट परोस दिया जाता था।
अब जो अगुआ होते, वे बड़ी बारीकी से हलचल को नोट करते कि शर्बत आने में कितनी देर लगी। हलवा कैसा बना है और एक जैसे बर्तन में परोसा गया कि नहीं। घर की सफाई कैसी है। आखिर बेटी को किसी सम्पन्न खाते-पीते घर में ही तो दिया जा सकता है। अब घर के मुखिया के साथ अगुआ से बात शुरू होने का समय आ जाता। घर के मुखिया शुरू करते, "रउआ सब आपन परिचय दिहुँ और रउआ सब के इहाँ के बारे में कइसे पता चलल?"
अब अगुआ में से एक जो उन्हें ले कर आये थे, बोलना शुरू करते।
"हमार नाम फलां बा और रहे वाला फलां गाँव के ही। रउआ हमरा त नई जानब, पर हमार बाबुजी के जानत होखब। उनकर नाम बा --------------- । उनकर ममहर उहे गांव में राउर ममहर बा। उनकर नाना ---------- रहन।"
"अच्छा-अच्छा। अरे उ त ओने के नाता से हमार मामा भइलन, आउर तू तब त हमर भाई हो गइले। कह हमार मामा के का हाल-चाल बा, कह।"
"वइसे उमर त होइए गइल हइन, लेकिन अभी टन-मने बड़े। अभी आपन क्रिया-करम सब अपने से कर ले वले"
और फिर बाकी लोगों के बारे में वही बारी बारी परिचय कराते हुए आने का कारण तक बता देते।
"हाँ, हाँ, शादी बियाह त लगावे से होइबे करला। अब तू जब ले के इनका आइल बड़, त सोचहीं के पड़ी। वैसे दो तीन गो अगुआ आइल रहन, पर अभी तक सोचले ना रही। सबमें कोई खराबी त ना रहे और बढ़िया तिलक दहेज भी देत रहन, पर हमरा कोई खास मन नाहीं भरल।हमरा त लईकी बढ़िया चाही, जे घर के काम धंधा कर सके और मेल मिलाप से रहे। दहेज-वहज त बाद के चीज बा। जेतना मिलला, उ बचे ला थोड़े, ओकरा से बेसिये खर्चा हो जाला। सब पइसा के बर्बादी बा। असली चीज लड़किये बा। कुछ लईकी के बारे में बताऊँ, कुछ पढ़े लिखे जानला की नाहीं। घर के काम-काज करला की नाहीं। देखे-लेखे में कइसन बा। फिर बढ़िया लागी त विचार करब।"
इस तरह बात-चीत का सिलसिला शुरू हो जाता और दोनों पक्ष एक दूसरे को संतुष्ट करने के लिए अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने की होड़ में लग जाते। अब सांझ होने को है। घर के मुखिया कहते हैं, "हम रउआ सब के बात से संतुष्ट ही। बाकी बात बाद में होई। अब सांझ होवे के बा। अब चलल जाव, खेत-खलिहान देखल जाव और दिसा-मैदान भी हो लेल जाई।"
और सब खेत की ओर निकल पड़ते, हाथ में एक-एक लोटा ले कर। पानी खेत के कुआं से भरा जाएगा। रास्ते भर खेती बारी के बारे में बताते हुए अपना दो हर बैल, गाय, भैंस भी दिखाया जाता, खलिहान और पुआल का ढेर की ओर इशारा कर बताया जाता कि कितना धान का खेत है और कितना धान पैदा हो जाता है, ताकि अगुआ को यह न लगे कि पैदावार बढ़ा-चढ़ा कर बताया जा रहा है। साथ में यह भी कहा जाता कि एतना पैदा पैदाइश हो जाला कि भगवान के कृपा से कभी खाने की कमी नहीं होती। खा पी कर इतना बच जाता है कि बेच कर बाकी सब काम चल जाता है। बस एक ही ई इच्छा है कि दोनों बेटे बढ़िया से पढ़-लिख जाएं। वैसे इतना तो 'अरज' ही दिए हैं कि नौकरी-चाकरी नहीं भी करेंगे तो कभी भूखे नहीं रहेंगे।
अब दिसा - मैदान के बाद वापस द्वार पर आ गए हैं। एक राउंड चाय भी चल चुका है। इस बीच अगुआ के खबर सुन गाँव के दो तीन और लोग भी आ गए, या संदेश भेज बुला लिए गए हैं चाय पीने के बहाने। बात-चीत का अगला दौर शुरू होता है। लड़के के पिता से गाँव बुजुर्ग पूछते मेहमानों की जानकारी लेते हैं और बातचीत कहाँ तक पहुँची, यह जानने की जिज्ञासा प्रकट करते हैं। सारी बातें सुनने के बाद कहते, अगुआ से पूछते हैं कि सबकुछ देख-जान ही लिए, तो रिश्ता पसंद है कि नहीं। लड़की के पिता अब बोलना शुरू करते हैं।
"हमरा तो सब कुछ पसंद बा, अब त इहाँ का के बतावे ला बा कि हमार रिश्ता पसंद बा कि नई?"
"ना, ना, हमरा आउ का चाही। लड़की कामकाजी बा, मैट्रिक तक पढलो बा। फिर रिश्ता पसंद काहे न आई? हमरो ई रिश्ता पसन्दे बा।"
अब बुजुर्ग मध्यस्थ बन कर रिश्ता करवाने का श्रेय लेने को सोच कर शुरू हो जाते हैं, "जब दुनों के मन भरिए गइल बा, तो आगे लेन-देन के बात भी करिये लेवे के चाही। काहे कि एकरा बिना तो रिश्ता पक्का होइ नाहीं। कुछ एकरो पर बातचीत होईल बा कि नाहीं।"
"नाहीं, अभी त बात नइखे भईल। लेकिन हम निराश ना करब। बेटी के देवे के शौक हमरो बा।लेकिन कुछ बतावल जाई और हमरा शक्ति भर होइ, तो जरूर देवब।"
"ई त अपने नहींए बोलिहें। आखिर रउरो तो कुछ बताईं, त इहो आपन कुछ कहीहें"
इस बीच लड़के के पिता बुजुर्ग को कुछ इशारा कर, कुछ बहाना बनाते हुए अंदर चले जाते हैं।
फिर बुजुर्ग कहते हैं, " ई तनी ई सब मामला में लजालू हथ, हमरा से कुछ कहूँ, कुछ ओकरे में ऊपर नीचे कर करा के रिश्ता पक्का करवा देब।उ हमार बात त नाहीं उठहीहें।" लड़की के पिता अपनी औकात के अनुसार प्रस्ताव रख देते हैं। पिता के आने पर बुजुर्ग उन्हें एक तरफ ले जा कर प्रस्ताव को बताते हैं। फिर आ कर कहते हैं "ऊ तैयार बाड़े, बस रउआ थोड़ा सा और बढ़ जाऊं। बेटी वाला के थोड़ा हिम्मत देखावे के पड़ला।"
लड़की के पिता ने हिम्मत की और प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। फिर बारी आई लड़के को कुछ देने की। लड़का कॉलेज में साइंस का स्टूडेंट है। उसे भी खुश रखना जरूरी है। अब बुजुर्ग फिर बात आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, " बासन-बर्तन त अंगना के शोभा होखला। उ सब त रउआ जे समझ में आई, देबे करब। लेकिन लड़का के आजकाल डिमांड रह ला साईकल, घड़ी आउ बाजा ( ट्रांज़िस्टर)के। लोग भी देख ले कि लड़का के का का मिलल।
त हमरा तरफ से तीनों चीज दे देब।आउर अब शादी पक्का समझूँ।"
लड़की के पिता ने यह बात भी मान ली।
तब बुजुर्ग ने लड़के के पिता से कहना शुरू किया, "अब त सब डिमांड पूरा करेला तैयार ही इहाँ का।तब अब शादी ला हाँ कर द। "
"हमरा तरफ से हाँ बा। लेकिन तनी लइकवा के माई से भी पूछ लिही ला।" और यह कह कर अंदर चले जाते हैं, लड़के के पिता। फिर कुछ देर में बाहर आ कर कहते हैं , " लइका के माइयो के रिश्ता पसंद बा। उ कहत बाड़ी की बर्तन तनी ठोस चढ़ाइहें, न तो अंगना में जग हंसाई हो जाई। जाके कहूँ कि समधिन के एगो डिमांड बा लोहा के अलमारी भी दे दीहें।आउ बियाह पक्का कर देउँ।"
अब बात समधिन को खुश करने की है। लड़की के पिता के औकात से अब बाहर हो रहा है। पर बेटी को तो सास के साथ ही रहना है, तो यह बोझ भी उन्होंने ने सहन कर लिया।
और तरह बियाह पक्का हो गया। रात को कच्ची खाना (भात, दाल, कई तरह की तरकारी, तिलौरी, अदौरी और घी) परोसा गया।खाने के बाद अगले दिन पक्की भोजन (पूड़ी, धुस्का, दुधौरा, केरा-दुधौरी) कर के ही जाने की बात हुई, क्योंकि पक्की भोजन का मतलब शादी का पूरी तरह पक्की हो जाने की बात की पुष्टि हो जाती है। और हाँ, पक्की भोजन के समय गारी भी गाई जाएगी।
उसके बाद लड़का आ कर पवलगी करेगा। होने वाले ससुर उसे कुछ पैसे देंगे, जिसे बरछिया (छेंका) मान लिया जाएगा।
मैंने ने यह लेख अपने बाबुजी से बात कर के साठ-सत्तर के दशक में उनके गांव और आस पड़ोस के अनुभवों को साझा किया है। कई अन्य लोगों और जगहों पर तरीका अलग होगा, पर एक बात सामान्य जरूर होगी कि दहेज सभी जगह किसी न किसी रूप में मौजूद था और आज भी है। मैंने जान-बूझ कर किसी ऐसे शब्द का प्रयोग नहीं किया है, जिससे लेख में किसी जाति का बोध हो।
हाँ, एक बात का उल्लेख नहीं किया है, लड़की देखने का। तब सचमुच हमारे गांव में लड़की देखने की प्रथा नहीं थी। जैसा बताया गया, मान लिया जाता था कि लड़की अच्छी ही होगी। बाकी लड़का का भाग्य।
आर्टिकल: Sunny Shukla Rohan
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू
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