संभवतः शीर्षक पढ़ते हुए आपके मुंह में पानी जरूर आ गया होगा। मेरे हिसाब से नीम्बू की निमकी को अचारों का राजा कहा जाये, तो शायद ही किसी को आपत्ति हो। Old is Gold वाला कहावत भी पहले इसी के लिए बना होगा, काहे कि इ जितना पुराना हो, उतना ही बढ़िया माना जाता है।
आजकल के समय में विधा के अभाव में या फिर अन्य तरह के अचारों के बाजार में सुलभ होने के कारण, यह हाशिये पर गया हुआ मालूम पड़ता है (अगर आपके विचार इससे भिन्न हों तो मुझे ख़ुशी होगी), लेकिन एक समय था कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि किसी के घर में नीम्बू की निमकी न मिले। गाँव में लगभग हर घर में छप्पर/छत/ओटा/अंगना, कहीं न कहीं आपको नीम्बू की निमकी से भरा एक-दो बोइयाम(बोवाम/बोयाम/मर्तबान) जरूर दिख जाता था।
अच्छा, इसे बनाने में भी किसी तरह का कोई रॉकेट साइंस और महारत नहीं चाहिए। चाहे तो समूचे नीम्बू को या फिर जरूरत के अनुसार उसको काटकर बोइयाम में भरिये, नमक डालिए और रहने दीजिये धुप में कुछेक दिन, हो जायेगा कुछ दिनों में तैयार। बाकि मसाले वाले अचारों की तरह कोई विशेष खर्च नहीं, न ही इसके खराब होने का डर। वैसे बाकि सभी अचारों के बारे में एक बात होती थी कि फलना के हाथ का अचार बहुत बढ़िया सुतरता है, हम लगाते हैं, तो भुवा जाता है आदि-आदि। निमकी लगाने में कोई डर नहीं, निश्चिंत हो के लगाइए और परफेक्ट अचार पाइए।
वैसे तो नीम्बू का मसालेदार अचार भी बनाया जाता है लेकिन फिर उसे हम बाकि अचारों की श्रेणी में ही रखेंगे।और नीम्बू की निमकी को एकदम अलग। हमारे बचपन के समय का शाश्वत नास्ता, सूजी का हलवा का सहगामी के रूप में आप इसे जरूर याद करेंगे। सूजी के हलवा के साथ नीम्बू का अचार - बहुत ही स्वर्गिक संयोग होता था, इस खट्टे-मीठे स्वाद का। हमारे मनोनुकूल भोजन न बना हो घर में, तो वैसी स्थिति में मिन्नत कर इसे अपनी थाली में शामिल कराना और फिर चाव से खाना खतम करना लगभग एक नियम सा बना लिया था हमने।
और गुणकारी इतना कि पूछिए मत, पेट सम्बन्धी विकारों के लिए पुदीन-हरा से पहले इसी का बोलबाला था। किसी को अपच हो, धुवईन्धा ढकार आये, पेट खराब हो, सबके लिए नीम्बू का निमकी रामबाण होता था। कुछेक परिस्थितियों में तो इस अचार का पानी पीने (सादे पानी में घोलकर) की सलाह भी मिलती रही थी और ये तो एकदम आजमाया हुआ है कई बार।
एक बात गौर किये होंगे आप कि पुराना वाला नीम्बू के अचार को बीच से काटिए तो छिलके के अन्दर वाला हिस्सा पककर एकदम सुनहले रंग के शीशे की तरह का हो जाता था और मजे की बात तो यह कि लईकाई में हमलोग सोचते थे कि शायद शीशा इसी से बनता होगा और फिर कई तरह की कल्पना कि दुनिया में जितना शीशा है (मतलब हमलोग जितना देखे थे) उसको बनाने में कितना निमकी बनाना पड़ा होगा, कौन लगाता होगा इतना निमकी और पता नहीं क्या-क्या आला-गाजा।
एक बात और लगभग सभी ऑनलाइन प्लेटफार्म पर मैंने देखा कि नीम्बू की निमकी उपलब्ध है, सुन्दर डिब्बा में पैक करके और अंग्रेजी में इसका वर्णन करके इसको हज़ार रुपये किलो तक बेचा जा रहा है। क्या कहें, हज़म नहीं हुवा एकदम, भला ऐसा क्या कर दिए आप इसमें, कौन सा घीव लगा के बनाये हैं। वैसे भी, हम तो अपने लिए नीम्बू का अचार लगा लिए हैं, बेचते रहिये आप।
आप भी अगर नीम्बू के अचार के शौक़ीन है, तो फिर कमेंट बॉक्स में जरूर साझा कीजिये अपनी खटमीठ यादों को।
आर्टिकल: ऋतेश कुमार
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू

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