स्लेट और खल्ली से पढ़ाई की शुरुआत करे के बाद आया, कॉपी पर अक्षर बना के लिखने का दौर। याद है जब बचपन में स्लेट, एक सूती कपड़ा और खल्ली लेकर हम स्कूल जाते थे।
'क' से शुरूआत करके 'ज्ञ' तक पहुंचना कोई आसान बात नहीं थी, उसपर अगर चुनौती हो सुंदर लिखने की, तो यह और भी मुश्किल था । खल्ली से लिखते लिखते हाथ उजर हो जाते थे और उसका जो पाउडर गिरता था, उसे हम लोग एक दूसरे के चेहरे पर भी मल लिया करते थे, यह कहते हुए कि इससे भकभक उजरकी गोराई आ जाएगा मुंह पर(तब तक फेयर एंड लवली का आविष्कार नहीं हुआ था )!
कुछ दिनों के बाद यह सिलसिला भी खत्म हुआ और लिखने के लिए मिलने लगी कॉपी। 'वैशाली कॉपी' की धूम थी उस दौर में। चिकने पन्ने वाली वैशाली कॉपी, उस दौर में 50, 75, 85 पैसे की मिलती थी। जिसमें गोल-गोल सुंदर लिखावट दर्ज करते हुए रोज 'लिखना' लिखने का होमवर्क मिला करता था। दलील यह थी कि रोज एक पन्ना हिंदी और एक पन्ना इंग्लिश लिखे से राइटिंग बढ़िया बैठने लगेगा। 'वैशाली कॉपी' और 'डिप्लोमा पेन' से राइटिंग बनाते हुए लिखने की कोशिश में बहुत बार ऐसे ही लिखने की आदत बनती गयी। यह वही दौर था जब हमारे पास पेन (खासकर डिप्लोमा पेन ) हुआ करती थी, जिसके 'बकने' से कपड़े खराब हो जाते और घर में मार पड़ने की संभावना प्रबल हो जाती थी। दो ऊंगलियों के बीच पेन को दबाकर लिखते-लिखते ऊंगलियों में दाग पड़ जाता तो कभी स्याही लग जाती।
आजकल के बॉल-पेन , जेल-पेन और लिड-पेन वाले बच्चे उस दर्द को भला क्या समझेंगे! 'क्लासमेट' यूज करने वाले बच्चे ' वैशाली ' कॉपी से जुड़ी भावनाओं को भला क्या समझेंगे! वैशाली कॉपी हमारे लिए सिर्फ कॉपी नहीं थी, बल्कि हमारी जिंदगी का इतिहास, वर्तमान और भविष्य के पन्ने उससे जुड़े थे। जिससे हमारे जैसे बहुतेरे लोगों ने लिखना सीखा, अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी, भविष्य को उजाला दिया। दीवाली की सफाई में बचपन की स्मृतियां कभी मनोहर पोथी, कभी किंग रीडर, कभी वैशाली कॉपी, तो कभी डिप्लोमा पेन के रूप में सामने आईं, तो लगा काश कुछ पल और हम उस जीवन को जी लेते। जहां पेंसिल की नोंक तोड़ देने वाले, कॉपी पर 'छेछ' देने, कलम से स्याही 'बकवा' देने वाले दोस्तों से भी पलभर में 'कुट्टी' और 'मेल ' हो जाया करती थी।
अब न वो दौर रहा, न वो दोस्त, न जिंदगी की लिखावट के लिए वो ' वैशाली ' कॉपी। आप भी अपनी बचपन की स्टेशनरी की यादें कमेन्ट बॉक्स में जरुर शेयर करे।
आर्टिकल एवं तस्वीर: शर्मिला शुमि
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू

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