डेढ़-गोड़िया जो हमलोग अपने भाषा मे बोलते हैं साइकिल सीखने का दूसरा स्टेज है। कोई-कोई इसको "कैची" भी बोलता है। डेढ़-गोड़िया इसलिए क्योंकि इसमें एक पैर इधर और दूसरा आधा पैर डंडी के बीच मे होता है।
हमलोग के गाँव मे उस समय मोटर साइकिल का चलन नहीं आया था। किसी-किसी के घर मे ही राजदूत या हीरो-हौंडा दिखता था, लेकिन साइकिल लगभग हर घर में यातायात का प्रमुख साधन हुआ करता था। अब तो जबसे ये फाइनेंस का सिस्टम आया है, सब लोग मोटर-साइकिल और कार खरीद रहे हैं और साइकिल बेचारा उपेछित विलुप्ति के कगार पे आ गया है।
अभी की तरह उस समय बहुत प्रकार के साइकिल नहीं हुआ करते थे, जैसे छोटा साइकिल, तीन पहिया वाला बच्चों का साइकिल और अगर होता भी होगा तो गाँव मे देखने को नहीं मिलता था। गाँव मे बुढ़वा साइकिल 24 इंच वाला ही हर घर मे पाया जाता था। रेंजर-वेंजर ले के कोई लइका ट्यूशन मे आ जाता, तो वो आकर्षण का केंद्र बन जाता था।
उस दौर मे साइकिल का सुरक्षा का ख्याल भी काम नहीं रखा जाता था। नार्मल ताला के साथ पाइप वाला ताला अलग से लगाया जाता था। उसका नाम तो नहीं पता, लेकिन स्पोक के बिच मे घुसा के पूट से लॉक हो जाता था। अगर किसी को उसका नाम पता हो तो कमेंट बॉक्स में जरूर बताइएगा।
अभी के लइकन मे जितना ललक मोटर साइकिल सिखने का है, उससे ज्यादा ललक हमलोग को साइकिल सीखने का हुआ करता था। उस समय साइकिल का चाभी प्राप्त कर लेना कोई मिशन से कम नहीं होता था। चलाने भले ना आता हो, लेकिन साइकिल को डुगरा के ले जाने मे ही हमलोग परम आनंद की प्राप्ति कर लेते थे। फिर सिखने का प्रयास का प्रारम्भ होता था, एक गोड़ डंडी के अंदर डाल के पैण्डल पे रखते थे, फिर दूसरा पैर से धकेलते हुए पैण्डल को ऊपर नीचे करते थे। फिर कोशिश करते थे कि दूसरा गोड़ जिससे धक्का दे रहे थे, उसको भी दूसरा पैण्डल पे रख ले। यकीन मानिये नील आर्म स्ट्रांग को चाँद पे पैर रखते हुए इतना खुशी नहीं हुआ होगा, जितना खुशी हमको तब हुआ था, जब दोनों पैर हम पैण्डल पे रख लिये थे। दोनों गोड़ पैण्डल पे रखने के क्रम मे जब गिरते थे, तो सीधे ठेहुना फुटता था। अगर साइकिल सिखने मे आपका ठेहुना ना फूटा तो आप क्या ही साइकिल सीखे।
साइकिल सिखने के बाद भी एक समस्या है अपने घर वालो को यकीन दिलाना की आप सीख चुके हैं। फिर ये साबित करने के लिए आपको जबरदस्ती चला के दिखाना पड़ता है। इस दौर को पार करने के बाद आप घर के लिए आटा पिसवाना, दवाई लाना, कंपाउंडर बुला के लाने जैसा काम के लिए उपयोगी हो जाते हैं। सीट पे बैठ के चलना भी JPSC उत्तीर्ण करने जैसा कठिन होता है जो अगला भाग में मजेदार तरीके से प्रस्तुत करेंगे।
आपके रंग मे रंगते हुए....
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू

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