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नशेमन के तिनकों से सपने सजाना, मुश्किल अगर हो नया घर बसाना।
अगर हौसला हो तो चलते चलो तुम, कहीं तो मिलेगा कोई आशियाना।
उस दिन तारीख थी 22 नवंबर 2005 और झारखंड विधानसभा की पांचवीं वर्षगांठ मनाई जा रही थी। महान गायक भूपिंदर सिंह और उनकी पत्नी मिताली सिंह 'गजल संध्या' के मौके पर प्रस्तुति देने के लिए मंच पर थे। मंच पर भूपिंदर बोलते हैं, ’अब मै रविशंकर पांडेय द्वारा लिखित उस गीत को प्रस्तुत करने जा रहा हूं जिसे मैंने 'घरौंदा' नाटक के लिए गाया था। शुरुआत में लिखी गईं पंक्तियां उसी गीत की हैं। जैसे ही भूपिंदर यह गीत गाते हैं, पूरा हॉल तालियों से गूंज उठता है।
यह विधानसभा के अधिकारी और पलामू जिले के बड़कागांव निवासी रविशंकर पांडेय के लिए यादगार मौका था। मखमली आवाज वाले गायक भूपिंदर के निधन के बाद वह काफी दुखी हैं, उनकी यादों में खोए हैं। वह कहते हैं, 'सच पूछिए तो भूपिंदरजी एक महान गायक ही नहीं, महान इंसान भी थे। आज मैं रोम-रोम से उनके लिए श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा हूं। मेरी आवाज ही पहचान है... दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन... कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता... और एक अकेला शहर में रात में या दोपहर में...जैसे गीतों को आवाज देने वाले भूपिंदरजी को भला कौन संगीत प्रेमी भूल सकता है? उनका निधन हिंदी सिनेमा जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है।'
रविशंकर पांडेय उन दिनों मुंबई में रहते थे। वहीं लेखन करते थे। उनकी कविताएं और संवाद कई नाटकों के हिस्सा रहते थे। वह रहते थे अंधेरी पश्चिम जैसे पौश इलाके में। उनके घर के सामने एक ट्रिनी टाॅट स्कूल था। बच्चों की कक्षा चलने के बाद यह स्कूल दोपहर दो बजे से रात दो बजे तक रिहर्सल के लिए बुक रहता था। मराठी रंगमच से जुड़े अनिल महात्रे और हिंदी रंगमंच से जुड़े राकेश दुबे से इनकी गहरी मित्रता हो गई थी। वह बताते हैं, 'एक संयोग ऐसा हुआ कि प्रधानमंत्री राहत कोष के लिए दो-दो नाटकों का एक साथ रिहर्सल चल रहा था। इनके निदेशक राजेश दुबे थे और प्रोड्यूसर थे डीएन मूंदरा। एक नाटक था शंकर शेष लिखित 'घरौंदा' जिस पर फिल्म भी बन चुकी थी। दूसरा नाटक था 'क्या यही है जिंदगी' । दोनों ही बड़े बजट के नाटक थे। फाइनेंसर भी मूंदराजी ही थे। पता नही किसके दिमाग मे ये बात आई कि इन नाटकों के लिए भी गीत लिखवाए जाएं और किसी बड़े गायक से गवाया जाए। तब मेरे सामने प्रस्ताव आया कि पांडेय साहब आप घरौंदा नाटक के लिए ठीक वैसा ही लिखिए जैसा फिल्म घरौंदा के लिए गुलजार साहब ने लिखा था। बैक ग्राउंड से वह गीत पूरे नाटक में चलेगा। गीत भी डुवेट होना चाहिए जिसे नायक और नायिका दोनों गाएंगे। मूंदराजी ने तत्काल मुझे इस काम के लिए अनुबंधित भी कर लिया। मैंने जो गीत तैयार किया उसके पांच अंतरे थे। मुखड़ा था- "नशेमन के तिनकों से सपने सजाना, मुश्किल अगर हो नया घर बसाना। अगर हौसला हो तो चलते चलो तुम, कहीं तो मिलेगा कोई आशियाना।" गीत की धुन बनाी थी शत्रुघ्न तिवारी ने। भूपिंदर जी ने तो पहले ना कर दिया था। पर गीत की धुन और बोल सुनने के बाद राजी हो गए और रिकॉर्डिंग मे पूरे पांच दिन का समय लगा। रिकॉर्डिंग का काम पूरा होने के बाद भूपिंदर जी ने शत्रुघ्न तिवारी से कहा था- यार तिवारी तूने पैसे दिलवाये एक गीत के और गवा लिए पांच गाने। दरअसल नाटक के सिचुएशन के हिसाब से जो पांच अंतरे थे उसके कारण पूरा गीत 15 मिनट का हो गया जब कि एक गीत अमूमन तीन-चार मिनट का होता है। पर वह गीत ऐसा हुआ कि जिसने भी सुना मंत्र मुग्ध हो कर सुनता रह गया।
जब विधानसभा में भूपिंदर ने रविशंकर पांडेय ने गीत गाया तो उस समय विधानसभा अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी भी पलामू के थे। उनके निजी सहायक अनूप कुमार लाल भी पलामू के थे। अनूप कुमार लाल उस क्षण को याद करते हुए कहते हैं, ‘यह हर पलामूवासी के लिए अत्यंत ही गर्व की बात थी कि भूपिंदर जैसे महान गायक पलामूवासी के गीत को मंच से गा रहे थे। भूपिंदर जी के निधन की खबर के बाद वे सारे दृश्य सामने आ गए हैं।’
पलामू के गीतकार के गीत को आवाज देने वाले महान गायक भूपिंदर सिंह को पलामूवासियों की ओर से श्रद्धांजलि।
©प्रभात मिश्रा सुमन
वरिष्ठ पत्रकार अमर उजाला नोएडा

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