आज श्रावण की पहली सोमवारी है. पुराने मंदिर में पूजा करते वक़्त जब अर्सों बाद आज ताज़े बेलपत्र देखा तो मन यादों में खो गया. तभी पति से पत्तों पर "राम" लिखने वाली बात कही तो मन उत्साह से चहक उठा, कि हाँ ऐसा ही तो पहले करते थे... पहले यानी सालों पहले. मज़ा आएगा दोहराने में.
श्रावण के सुबह की शुरुआत आस पास बजते शिव जी के भजन से होती थी. यानी जो कहानी न मालूम हो वो किसी भजन से पता चल जाता था. कुछ कुछ ऐसे भी किस्से बजते थे जो शायद स्वयं शिव जी को भी नहीं पता होगा.
घर में एक विशाल बेल का पेड़ था,100 वर्ष पुराना,आज भी है. सावन में आस पास के लोगों के साथ हँसते चहकते हम बच्चे भी अपने बाबा संग बेलपत्र तोड़ते थे. बड़ा मज़ा आता था. उन्मुक्तता में हमेशा सोचती थी, एक रिसर्च करुँगी इन सारे औषधीय पौधों पे घर पर ही.
मुझे याद है श्रावण के सोमवारी को सुबह जो पूजा होती थी उसमे सारे बच्चे भी ध्यान से पूजा करके ही स्कूल जाते थे. बड़ी अलग सी सकारात्मकता आती थी पढाई में. पढाई, मूल्य और अनुशासन में बहुत सख्ती होती थी, इसलिए आस्था पर एकाग्रता बनी रही. बाद में बैद्यनाथ धाम, काशी विश्वनाथ जी और कई स्थानों पर गयी तो मन में अटूट छवि बैठ गयी.
सावन में बाबा धाम की याद गेरुए रंग में लिपटी भक्तों की आस्था के साथ आती है. और घर की याद में आते हैं वो छुट्टी के दिन, जब हम पर-बाबा का बनवाया, पुश्तैनी राम मंदिर में अभिषेक करते थे बाबा दादी के साथ. काफी भीड़ होती थी. बहुत ही सुन्दर वातावरण और ढेर सारे प्रफुल्लित लोग मंत्र गाते हुए...
सावन के महीने में बारिश और हरे हरे पत्ते ऊर्जा को और बढ़ा देते थे. स्कूल से उन्मुक्तता के साथ घर आते थे , बारिश में कभी मौका पाकर थोड़े भीगते हुए. वो ख़ुशी न जाने कहाँ खो गयी. सबकुछ वैसा ही है, बारिश भी है पर वो उन्मुक्तता अब और नहीं!
एक बार की बात है. मैं छोटी थी. बचपन के कई यादों में से ये साफ़ साफ याद है. तेज़ बारिश हो रही थी. पेड़ों की कुछ टहनियां तहस नहस हो गयीं. मैं बरामदे से तेज़ बारिश बहुत ध्यान से देख रही थी. अचानक मेरा सारा ध्यान उस नन्हे से बेल के पेड़ पर अटक कर रह गया जो इतनी बारिश और तेज़ हवा में भी पूरी तरह सुरक्षित था. एक भी पत्ता तक नहीं टूटा उसमे से. उस पेड़ को किसीने लगाया भी नहीं था. मेरी एकाग्रता उसपर टिकी रही और बारिश थमते ही मैं उस पेड़ के पास गयी, तो पायी उसमे सारे 6 पत्तों से अधिक वाले बेलपत्र. कोई 7, तो कोई 11. मैं देखकर अचंभित हो गयी. ये तो ईश्वर का आशीर्वाद स्वरुप ही था. पत्ते तो प्राकृतिक हैं, पर वो बचे रहे. शायद मेरी आस्था को और मज़बूती देने के लिए. कुछ बातें विश्वास की होती हैं. मैं वो बेलपत्र शिव जी पर चढ़ा आई.
घर में खासकर बाबा, दादी, माँ, औरों को जब सोमवारी में शिव जी पर जल बेलपत्र चढ़ाते देखती थी तो मेरा मासूम बाल-मन सोच में पड़ जाता था कि क्या सचमे शिव जी को ये अर्पित करने से ख़ुशी मिलती है. पर जिनके पास येसब न हुआ तो ? वो कैसे....? मुझे बड़ी चिंता होती थी ऐसे लोगों की, जिन्हे मैं सड़क पर बेसहारा देखती थी, उन मरीज़ों की जो अस्पताल में तकलीफों में असहाय होते थे. कितनी आस्था होगी उनके अंदर....पर क्या करें.. ? कैसे...? मुझे पूजा करते समय उनसब की याद आती थी और ऐसे अमिट सवाल.. माँ उनसब ज़रूरतमंद लोगों के नाम से संकल्प करवा देती थीं.
बचपन में श्रावण के आते ही परिवार व आस पास की बड़ी बहने घर में लगी मेहँदी के पेड़ से ताज़े पत्ते तोड़कर उसे पीसने और मेहँदी लगाने के उमंग में लग जाती थीं. फिर राखी भी तो आ रहा होता था. तो महिलाओं को हम भी राखी में भाई के नाम मेहँदी कहकर शुरुआत से ही मेहँदी पीसने लगाने में जुट जाते थे. उस मेहँदी के रंग चढ़ना अलग ही मुश्किल उपलब्धि होती थी. और जो चढ़ गया तो उतरना मुश्किल. रंग धीमे धीमे जाते थे. आजकल के कृत्रिम मेहँदी जो तुरंत चढ़े और उतरे, ऐसा नहीं.
मज़ेदार बात ये है कि इन सारी चीज़ों का आनंद तो मैं लेती थी पर मैं मेहँदी कभी नहीं नहीं लगाती थी, बचपन में इनसब का शौक नहीं था. और स्कूल में अनुमति न होना मेरे मन में उमड़ रहे मेहँदी के प्रति लगाव के बावजूद, पसंद न होने के मलाल को कम करता था. अब बहुत अच्छा लगता है मेहँदी लगवाना, पूजा ध्यान से सुख शांति बटोरना और फिर आने वाली राखी में उन्ही आशीर्वाद में ढेरों दुवाएं मिलाकर भाइयों पर न्योछावर कर देना..
आज भी कहीं पुराने सा घर देखती हूँ तो नज़रें बेल के, मेहँदी के पेड़ को ढूंढती हैं. जब घर जाती हूँ तो उन पेड़ों को देखकर अपने हँसता खेलता बचपन याद करती हूँ, जिनके ये पेड़ साक्षी हैं, जिन्होंने अपने आस पास हमें बड़ा होते देखा है.
सचमुच श्रावण का महीना पुराने हरी भरी यादों की कई खिड़कियाँ खोलता है. जाने कहाँ गए वो दिन.! मन सोच में खो जाता है फिर उन्ही यादों से ताज़गी लेकर नयी खिलखिलाती यादें बनाने में जुट जाता है.
अचानक ध्यान आया कि आज पूजा के बाद मैं काफी देर तक पहाड़ों के बीच इस पुराने स्वयंभू मंदिर में बैठी रही. ईश्वर को लाखों धन्यवाद् मुझे फिर से बचपन में ले जाने के लिए. इस पवित्र आभास के लिए.
©रश्मि.

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