Monday, February 21, 2022

पलामू, मगह और भोजपुर में रेल के सवारी

 


-अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस विशेष
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हमीन दूनो भाई नाया आंगा-पैंट में तैयार होत रही कि गांव के लइकन आके कहलन, ‘का गोय...ममहर जात बड़े का।’ हमीन के जवाब रहे, ‘हं गोय...जात त हिअ। ऊहां से डिहरी जाएब फिर पंडुका जाए के बा।’ ई बात सुन के सब ई कह के हंसे लगलन की वाह ईआर तोहिन त एके बार में पलमूआ, मगही आऊ भोजपुरी तीनो बोल देले। असल हमीन के दू गो गांव के निवासी ही। पनेरीबांध पलामू में बा त पंडुका रोहतास (पुराना आरा-भोजपुर) जिला में। ममहर मगह औरंगाबाद (पुराना गया) में। ये ही कारण बा कि हमीन दूनो भाई करीब-करीब समान अधिकार से तीनों जगह के बोली में बतिआ लिही ला। आज हम बचपन के रेल यात्रा के वर्णन करत ही। जब हम पलामू में रहब त भाषा पलमूआ रही, मगह में रहब त मगही आऊ रोहतास में रहब त बात भोजपुरी में लिखल रही।
लईकाई में हमीन दूनो भाई आपन मां के दिदिया कहत रही। दादी हमीन के माई रहन। स्कूल में छुट्टी होइला पर पहिले का आझो ममहर जाए के परंपरा बा। हमीनियो मां-पापा के साथ रेल धरे ला डालटनगंज स्टेशन पहुंचली। हम बढ़ रही त हमार हाथ में पानी से भरल सुराही रहे त छोटका भाई के हाथ में कचौड़ी, भुंजरी आऊ आम के अचार के झोला रहे। तब ना त ट्रेन में आझ लेखे पानी बेचात रहे न खाए-पिए के सामान। खैर, धुआं उड़ावत रेल आईल। पापा पहिले मां के चढ़ईलन फिर हमीन दूनो भाई के फिर अपने चढ़लन। रेल बरवाडीह से आवत रहे एही से सीट मिले में आसानी भईल। रेहला पहुंचते ही भूख लागे लागल। फिर का रहे कचौड़ी-भुंजरी पर टूट पड़ली। अचार भी तनी-तनी चाटे में जे सुख मिलल ओकरा खाली फील कईल जा सकला। सोननगर से रेल बदल के हमीन अनुग्रह नारायण रोड पहुंचली।
टिशन पर नाना हमनी के लेवेला पहुंचल हलन। उनका देखते ही हम ‘नाना हो’ कहके चिचिआए लगली। दौड़ के दूनो भाई उनकर गला में लिपट गेली। हमनी के कपार में लगल कोइला से उनकर ऊज्जर कुर्ता करिआ हो गेल। असल में हमनी खिड़की दने बइठल हली। रेल कोइला आउ भाफ से चले वाला हल। ई वजह से कोइला के छोट-छोट टुकड़ा हमनी के कपार में घुसल हल। नाना अप्पन लाल गमछी से हमनी के माथा झाड़ के पांवरगंज में मुंशी नाना के होटल में ले गेलन। मुंशी नाना के मिठाई आऊ उनकर मीठ बोली के कोई जोड़ ना हल। हमनी भर पेट मिठाई खाके ‘डॉज’ (मिनी बस नियन गाड़ी) पर सवार होके पाठक बिगहा पहुंचली।
हॉल के बहरे मामू लोग से 'ममुआ-भगिनवा’ के उद्घोष बाद बुढिया नानी से भेंट। फिर गांव घूरे के मजा। अगिला दिन से कभी टिशन तो कभी जम्होर, कभी मोर डिहरी तो कभी रेल लाइन के सैर। रेहट से लेके चहभच्चा मशीन पर स्नान के बाद आश्रम या बगईचा में खेलकूद।
अब यात्रा पैतृक गांव पंडुका के। तब हमीन दूनो भाई हाई स्कूल में पहुंच गईल रही। डिहरी से फूफेरा भाई के बरात नौहट्टा के बगल में कोई गांव में जाए के रहे। हमीन डिहरी से तिउरा-पीपराडीह जाए वाला रेल पर सवार होइली। ई ट्रेन एकदम ट्वाय ट्रेन लेखे रहे। साथे बढ़का चाचा भी रहलन। ऊ इलाका के इतिहास से लेके ट्रेन के बारे में बतावे लगलन। ई अईसन रेल रहे जेकर अगिला डिब्बा से उतर के खेत से झंगरी उखाड़ के पिछला डिब्बा में चढ़ल जा सकत रहे। ट्रेन जब रोहतास पहुंचल त आपन परबाबा के लिखल 'विनय षष्ठिका’ के ई श्लोक सामने आ गईल-
भुवन शेखर रोहित दुर्गतः;
सुनद शोणतटानु सृतिक्रमात्।
नयन योजन मार्गमतीत्सया,
सुनगरी निऋतेर्दिशि पण्डुका।
ये ही श्लोक गांव के परिचय बा। रोहतास गढ़ से दो योजन पर स्थित गांव जाए घड़ी रास्ता एतना सुंदर बा कि जेकर शब्द में चित्रण ना कईल जा सके। एक दने सोन नद त दोसर दने कैमूर के पहाड़ी। खेत-खरिहान के बीच से गुजरत ट्रेन। एकदम मन जुड़ाए वाला इलाका। भइया के बिआह के बाद पंडुका पहुंचला के बाद हित-नात से भेंट-मुलाकात। खांटी भोजपुरिया अंदाज में सेंकाईल लिट्टी-चोखा के मन भर भोजन। रोज सोन में स्नान फिर कुछ दिन बाद लौटे की तैयारी। नाव से सोन पार करके पलामू के श्रीनगर में इंट्री।
श्रीगर पहुंचते पापा के कुछ छात्र लोग मिल गईलन। यहां पहुंचते पलमूआ में बोली शुरू गईल। बस के नाम त ईआद नईखे पर ओकरा से हमीन भवनाथपुर पहुंचली। ईहां से डालटनगंज ला बस मिलल। गुड़ के मिठाई से लेके चिनिया बेदाम खात-खात हमीन फिर से डालटनगंज पहुंच गईली। बाबा के भोजपुरी में, माई (दादी) के पलमूआ में आऊ मां के मगही में सऊंसे कहनी सुना के दूनो भाई 'का गोय कने बड़े’ कहत ईआर लोग से मिले निकल गईली।
आज हम भले नौकरी करेला दिल्ली-एनसीआर के गाजियाबाद में ही पर पलमूआ, मगही आऊ भोजपुरी बोली सुनके मन खुश हो जाला। हमारे लेखे भावना न जाने केतना लोग के होखी। सभी के अंतराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के शुभकामनाएं।
©प्रभात मिश्रा सुमन
वरिष्ठ पत्रकार, अमर उजाला नोएडा
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