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पलामू में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा ,जो रसियाव से परिचित नहीं हो। इस शब्द को सुनते ही मन मिठास से भर जाता है।
ठेठ पलामू के पिछले पोस्ट में आपने पलामू के प्रसिद्ध कवि #हरिवंश_प्रभात जी की कविता को अवश्य पढ़ा होगा। उन्होंने अपनी कविता के शुरुआत में ही स्पष्ट कर दिया था कि -" गाँव में आजकल ऊख पेरा रहल बा।" शहरी भाषा में जिसे गन्ना कहते हैं। हमारे यहाँ उसे #ऊख या #केतारी कहते हैं। पहले हमारे यहाँ बनने वाले #रसियाव में इस गन्ने के रस का प्रयोग होता था। उत्तर प्रदेश के अवध इलाके में इसे रसियावल या बखीर के नाम से भी जाना जाता है।
तो यह #रसियाव पकाना कोई आसान काम नहीं है, बल्कि बहुत परिश्रम का काम हैे। कुछ लोगों का मानना है कि गोईठे की धीमी आंच पर इसे पकाया जाए, तब ही इसमें असली स्वाद आता है। इसे बनाने के लिए गन्ने के ताज़े रस को मिट्टी के बर्तन में उबलने दिया जाता है। उबलते समय रस में से जो ख़राब हिस्सा निकलता है, उसे कटोरी या चम्मच से निकाल कर अलग करते रहना पड़ता जाता हैं। जब रस ख़ूब गाढ़ा हो जाता है, तब इसमें (नया)अरवा चावल पड़ता है। इसमें शुद्ध दूध और मलाई के साथ कुछ लोग काजू, किशमिश, गरी, मेवा आदि ड्राई फ्रूट्स भी मिला देते हैं।
जब रसियाव पक जाता है, तब इसे और सोंधापन देने के लिए मिट्टी के नए बर्तन में रख दिया जाता है। फिर इसे कम-से-कम एक पहर बाद खोला जाता है। अब स्वादिष्ट रसियाव तैयार है। इसे सुबह बासी खाने का ग्रामीण अंचलों में ख़ूब चलन है। दरअसल दूसरे दिन बासी खाने से परम आनंद की प्राप्ति होती है। यह तो पहले जमाने की बात हुई। वैसे ग्रामीण अंचल में अभी भी, इस प्रक्रिया से स्वादिष्ट रसियाव बनता है।आपने भी इस प्रक्रिया से बने हुए स्वादिष्ट रसियाव को अवश्य चखा होगा।
अब शहरी क्षेत्रों और महानगर म़े लोग जानते भी नहीं कि कोलसार क्या होता है? हाँ! कभी-कभी ठेले में मशीन से पेराते गन्ने के रस को पीते हैं। जिसमें भी आधा बर्फ,नींबू रस और अन्य सामग्री का मिश्रण रहता है तो आजकल हमारे यहाँ भी गन्ने के ताजे रस की बजाय,उससे निर्मित गुड़ से ही रसियाव बनता है। बाकी बनाने की वही प्रक्रिया होती है। आपके यहाँ भी रसियाव बनता होगा, आप भी अपने अनुभव को बताइएगा तो हम सभी को बहुत अच्छा लगेगा।

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