Saturday, February 26, 2022

काव्य_कलश

 पेरात बाटे ऊख बा

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(गाँव में आजकल ऊख पेरा रहल बा, कोलसार चल रहल बा। ओकर दृश्य येही गीत में देखावे के कोशिश बा।)
गाँव के बगीचा में पेरात बाटे ऊख बा।
हुलसत लोग, बिहंसत बाटे रुख बा।
काट के केतारी छिल तोड़ के अगेर के,
शुरू कोलसार भइले, सुदिन सबेर के।
छोटी मोटी कुटिया में अगिन अथाह बा,
कल चले आवे रस, आग पर कड़ाह बा।
सबके "दुलारी" ऊख बाटे परमुख बा।
गाँव के बगीचा में........
महके मिठास माते गाँव केरा लोगवा ,
गरम गरम गुड़ के लागत बाटे भोगवा।
मुँह मीठा करि करि जाय राहगीर भी,
दान आउर भोग के जुड़ल संजोग बा।
मन खुशहाल, केहू के न बाटे दुःख बा।
गाँव के बगीचा में.......
कहत किसान सुन मेरी प्यारी धनिया,
तोहे के गढ़ाई देबो, नाक के नथनियाँ।
बाली देबो कान में, पयेर में पायलिया,
सुन सुन हुलसे, किसान के घरनियाँ।
खा ल पिया तोहे के लागल बाटे भूख बा।
गाँव के बगीचा मेें.....
©हरिवंश प्रभात
पलामू के प्रसिद्ध कवि
May be an image of animal and outdoors

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