Sunday, February 6, 2022

बिटिया की नज़र से सरसती पूजा...


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उत्साह और सादगी का संगम तो भई हमर गांव वला सरसती पूजा में रहे। पंडाल खुद ही बना लेते थे हमीन सब लोग मिल के। गांव घरे घूर-घूर के, माई पितियाईन सब से एकsगो साड़ी लेके जुगाड़ करे पड़ता था। मने नियम रहता था कि हर घरे से एगो साड़ी। कउनो घरे से मिलबो नहीं करता था कि कनहुँ साड़ी ना फाट जाए।
भोरे-भोरे छोटकन बचवन को बुला लेवल जाता था, गाजर छोलने के लिए। बड़कन लोग रात भर जाग के बुनिया छानता था। दू किलो बेसन के बुनिया बनल है कि चार कि छौ, एकरे से पूजा के भव्यता का अंदाजा लगावल जाता था। केतना बेसन में केतना डालडा, आउ केतना चीनी चाहिए, एकर जनकार तो मने भरल मिलते थे पूरा गांव में। बिना पुछले बतावे लगते थे कि "आएँ जी इतने बुनिया निकला हो?" खैर ओकरो अलगे मज़ा था उ जमाना में। बिना किचकिच कहूँ कउनो पूजा हुआ है का?
पहिला दिन त सब बचवन पूजा में शामिल रहता था। लेकिन दूसर दिन केकरो हिम्मत नइ होता था। होइबो तो करता था, दु-चार घंटा तक पूजा आउ हवन। अब छोट रेंगन में इतना बइठे के सबर नई न होता था। हमीन के तs बस परसादी से मतलब रहता था। बस पूजा करके मुंह दिखा देना रहता था, ताकि ज्यादा बुंदिया मिल सके।परसादी में गाजर हमरा कहियो ठीक नहीं लगता था। परसादी मने बुनिया; ऊहो भर पेट। अब चाहे केतनो कोशिश कर लेवल जाए ना, पर उ सवाद नहीं आता है घर पर बनावल बुनिया में।
हवन खतम होए के बाद रेंगन सब उदास हो जाता था। एतने देर ला एतना मेहनत झूठो ना कर दिए हमीन। कुछ दिन तs आउ मूर्ति रहना चाहिए था ना। सरसती पूजा आया नई कि चलियो गया।
साड़ी का टेंट खुले घड़ी तs आंख भर जाता था हमीन सब के। सब आपन कॉपी-किताब वापस ले जाये लगता था। फिर हमहुँ आपन मोटका किताब वापस ले आनते उंहा से। ओकर बाद तीन-चार लोग आते, आउ 'सरस्वती माता की जय' के नारा के साथ मूर्ति उठाके, गांव में घरे-घरे घूमाना शुरू कर देते। कयगो घर की नवकी बहुरिया सब बाहर नहीं न निकल पाती थी, उनकरो पूजा करे के चांस मिले ईहे से। सब घरे के लोग दुरा पे गोबर-माटी से लिप के शुद्ध कर देते थे। 'मूर्ति जी के स्वागत के लिए'। फिर गुड़, मिसरी, रोड़ीदाना के परसाद चढ़ावाल जाता था। साथ में देवी गीत तs कंपलसरी था।
बड़कन लोग माथा पे लाल-पट्टी बांधता था, जेकर पे 'सरस्वती माता' लिखल रहता था। पर हमरा कउनो कहियो नहीं दिया। हमरा तो बस नारा लगवे ला रखले रहता था। 'सरसती जै जै।'
कुछ गपोड़ी लोगों को लगता था कि मूर्ति जी रो रही हैं। लेकिन हमारा कहियो नहीं दिखा।
'जय सरस्वती माता' के नारों के साथ परतेक घर घुमावे के बाद 'मूर्ति जी को' दूर के तालाब की तरफ ले जाते थे। साथ में दूसरी ओर बैंजो के धुन पे रेंगन सब रस्ता भर नाचते रहता था। फिर कुछ बरियार रेंगन, जेकरा पानी में उतरे के एक्सपेरिएंस रहता था, तालाब में मूर्ति के साथ उतर के आगे गहरा पानी मे, जोर के नारा लगा के पहुंचा/छोड़ आता था। लौटते समय माहौल गमगीन रहता था। लगता था जैसे घर की बेटी बिदा हो गई है। अब घर सुना रहने वाला है, अगले वर्ष बिटिया के आगमन तक।
©रिया
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