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आज सुबह सुबह मैंने अपने छोटे भाई को अपनी किताबें बड़े ही लगन के साथ रखते देखा तो मैं चौंक गई कि जो कभी अपनी किताबों को हाथ नहीं लगाता वो आज किताबों को ऐसे रख रहा है जैसे कि वो अपनी फेवरेट चीजों को रखता है तभी सहसा याद आया कि आज तो सरस्वती पूजा है... जिसे हम बसंत पंचमी भी कहते हैं... विद्यार्थियों के जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखने वाला त्योहार है ये.
ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे छोटे प्राइवेट या सरकारी स्कूलों में चंदा जमा करके सरस्वती मां की मुर्ति और उससे जुड़ी सभी सामानों की व्यवस्था की जाती है.. शिक्षकों के सहयोग से बच्चे ही एक तरफ से इस पूजा के कर्ता धर्ता होते हैं... इसमे बच्चे ही इसके आयोजन कर्ता होते हैं... क्लास के अनुसार इन्हें काम की जिम्मेदारी सौंपी जाती है जिसमें कोई सचिव,उपसचिव, अध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, उपकोषाध्यक्ष बनते हैं. कोई प्रसाद की जिम्मेदारी लेता है, कोई प्रसाद न खा जाए ये देखने के लिए कुछ और भी दोस्तों को रख लिया जाता है.
प्रसाद के रूप में बुनियां के साथ साथ इस मौसम के लगभग फलों जिसमें की गाजर, मटर, बेर प्रमुख होते हैं और इसमे कहीं कहीं आम के मंजर भी प्रसाद के रूप में देखने को मिलता है. इसमे भी ये ध्यान रखा जाता है कि प्रसाद लेने कौन आ रहा है, उसे उसी हिसाब से प्रसाद दिया जाता है.
पूजा के समय सभी सज-धज कर जाते हैं... क्योंकि सभी पंडालों में जो जाना होता है और यहि एक मौका होता है जब स्कूल यूनीफॉर्म नहीं पहनना होता है. पूजा के साथ साथ बेरोकटोक स्कुल के साथ अगल बगल के चाट समोसे के दुकान पर अपनी सहेलियों के साथ जा सकते हैं.
लड़के रात रात तक जग कर पंडाल, टेंट लगाते हैं. मुर्ति एक दिन पहले ही ले आई जाती है और उसका चेहरा ढक दिया जाता है. स्कूल की कुछ फेमस लड़कियों को माँ सरस्वती की श्रृंगार की जिम्मेदारी सौंपी जाती है.
पूजा कराने हेतू स्कूल के ही हिन्दी या संस्कृत के शिक्षक को नियुक्त किया जाता है. पूजा के समय विद्यार्थियों को जिस भी विषय मे दिक्कत होती उसी की किताब माँ सरस्वती के साथ पंडाल मे रखी जाती.
पूजा सम्पन्न होने के साथ ही बच्चे प्रसाद के लिए हो हल्ला करनी शुरू कर देते. एक पंडाल से दूसरे पंडाल वे प्रसाद और मुर्ति देखने के साथ दूसरे स्कूल की कक्षाये कैसी है देखने के लिए स्कूल के हर एक वर्ग मे स्वच्छंद रूप से घूमते.
आज के दिन बच्चे किताबों को हाथ भी नहीं लगाते हैं, कारण तो किसी को भी पता नहीं होती थी पर अगाध श्रध्दा के वज़ह से किताबों से जो छुट्टी होती वो उन्हें दिनभर पंडालों मे घूम कर बिताया जाता हर एक जगह की व्यवस्था को देखा जाता. किसके यहां DJ है और किसका क्या थीम है?
आज के कोरोना काल में तो शायद इतनी मजेदार व्यवस्था न हो पाए पर क्रेज हमेशा उतना ही बना रहेगा.

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