Thursday, August 9, 2018

रजहरा

1857 की क्रांति में पलामू के लोगों ने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था. गवाह है रजहरा का बरगद. हमारे सैकड़ों क्रांतिकारियों को इसी बरगद के पेड़ से लटका कर फांसी दी गई थी !

अपने इतिहास के सूत्रों और आजादी की लड़ाई के स्वर्णिम पन्नो और गवाहों को ढूंढते-ढूंढते हम पहुंच गए रजहरा गाँव के बरगद की छाँव में. जहाँ कभी भरे बाजार में हजारों ग्रामीणों ने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंका था. लगभग पांच हजार ग्रामीणों ने पारंपरिक हथियारों से लैस हो कर रजहरा के माइंस को घेर लिया था और #बंगाल_कोल_माइंस कम्पनी के सभी मशीनों को बर्बाद कर दिया था, उसे आग के हवाले कर दिया था. वहाँ एक कोठी भी होती थी अब उसके सिर्फ खंडहर ही बचे हैं. उस समय अंग्रेजों के सभी बंगलो और कोठियों को भी घेर लिया गया था और सबको बर्बाद कर दिया गया था !

उस समय यह इलाका #बिश्रामपुर_राजघराने के अंतर्गत आता था. तथा तत्कालीन राजा भवानी बक्स राय थे. कहा जाता है अंग्रेजो और उनके बीच इस क्रांति को दबाने को ले कर समझौता भी हुआ था, परन्तु इसके दस्तावेज उपलब्ध नहीं है. सिर्फ जुबानी कहानियों में इसके कुछ किस्से क़ैद हैं.

रजहरा में इलाके का सबसे बड़ा बाजार लगता था. कोल माइंस होने के वजह से वहाँ भीड़ भी होती थी क्यूंकि सबसे सुखी सम्पन्न बाजार था वहां. इसीलिए अंग्रेज जनता में भय पैदा करने के लिए भरे बाजार में ही क्रांतिकारियों को फांसी दिया करते थे. 27-29 नवंबर 1857 को लगातार तीन दिन तक सैकड़ों ग्रामीण क्रांतिकारियों को फांसी दी गई थी!

जैसा कि पुरे देश में हजारों क्रांतिकारीयों ने मौत के फंदे को गले लगाया था, हमारे पूर्वजों ने भी जालिम अंग्रेजों की फांसी को हंसते हुए देश की खातिर स्वीकार कर लिया. और यह बरगद उन्ही की याद में अकेला आज भी खड़ा है.

नमन है उन शहीदों को जिन्होंने भारत के सबसे बड़े क्रांति में भाग लिया और अंग्रेजो के सामने झुकने की जगह उनसे लड़ना और शहीद होना पसंद किया!

परन्तु हमने क्या किया इन क्रांतिकारियों के सम्मान में?

जहाँ शहीदों की वेदी होनी चाहिए, जहाँ उनकी याद में शिलालेख होने चाहिए, जहां उनकी पूजा होनी चाहिए, वहाँ आज हमने शौचालय बना रखा है!

ये आज़ादी मुफ्त में नहीं मिली है हमे. ये हजारों-लाखों जानों के बदले मिली आज़ादी है. हमें सोचना होगा, कुछ करना होगा उन शहीदों के लिए. वरना इस आज़ादी के लायक ही नहीं हम!

हमारे सांसद Vishnu Dayal Ram जी खुद डीजीपी रहें हैं. उन्हें तो शाहदत की कीमत पता होगी. उनसे अनुरोध है कि इस जगह का सम्मान वापस दिलाएं.

और सभी पलामू वासियों से अनुरोध है कि इतिहास की जीती जागती तस्वीर को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने में सहयोग करें.

© Sunny Shukla

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