यह किसी पक्षी का नहीं झारखंड की प्रमुख नदी का नाम है. दो नदियां हैं - उतर कोयल और दक्षिण कोयल.
जैसा कि हम सब जानते हैं कि सभ्यता नदी किनारे ही विकसित होती है. और '#पलामू_का_इतिहास' में सत्यान्वेषी ज़ी ने यहां की नदियों और कैसे उनके किनारे हम बसे उसके बारे में हमें बताया. आज हम अपनी लाइफ लाइन #कोयल के बारे में पढ़ते हैं.
#दक्षिण_कोयल नदी झारखण्ड और ओडीशा से होकर बहती है। यह राँची से कुछ किमी पूर्व में पठार से निकलती है और दक्षिण की तरफ मुड़ जाती है. और अंत में यह उड़ीसा में प्रवेश करती है, गंगापुर में यह शंख नदी में मिल जाती है. इसका नाम यहां ब्राह्मणी हो जाता है इसकी प्रमुख सहायक नदी कारो है.
#उत्तर-कोयल यानी हमारी कोयल. यह नदी राँची के पठार के मध्य से निकलकर पाट के घुमावदार प्रवाह क्षेत्र से होती हुई उत्तर की ओर प्रवाहित होती है.
अपने उदगम से 255 किलोमीटर की दूरी तय कर यह सोन नदी में मिल जाती है. यह नदी गर्मी के मौसम में सूख जाती है, लेकिन वर्षा के दिनों में तुरन्त बाढ़ के साथ उमड़ कर बहने लगती है. मेदनीनगर के शहरवासी के साथ-साथ बेतला के जानवर भी लाभान्वित होते हैं, इसने कई गांवों को बसाया है. नेतरहाट की खूबसूरती हो या केचकी का पिकनिक स्पॉट सब की जिन्दगी इसी के सहारे है. इधर ही औरंगा और कोयल का खूबसूरत संगम है.
राँची और हज़ारीबाग़ पठार से होते हुए आने वाली औरंगा नदी और अमानत नदी इसकी सहायक नदियाँ हैं.
#औरंगा नदी राँची ज़िले के सोहिदा गाँव से निकलकर 80 किलोमीटर की यात्रा तय करती है और कोयल नदी में मिल जाती है. जब अंग्रेजों ने पलामू के चेरो राजाओं पर चढ़ाई की थी तो इसी नदी ने प्रहरी की तरह राज परिवार की सुरक्षा की थी. इसकी नदियों में शहादत के खून घुले थे.
#अमानत नदी हज़ारीबाग़ ज़िले से निकलकर कोयल मेदिनीनगर के पास 10 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में मिलती है, और आगे जा कर यह सिंगरा गांव में कोयल में मिल जाती है.
इस नदी पर #बूढ़ा_प्रपात है, जिसकी ऊँचाई 450 फ़ीट है. यह झारखण्ड का सबसे ऊँचा प्रपात है, जो महुवाडांड़ में है, और इसकी खूबसूरती देखते ही बनती है.
कोयल सिर्फ एक नदी नहीं बल्कि पलामू की जीवन रेखा है. छठ पूजा के वक़्त इस नदी की शान शौकत देखते ही बनती है. लगभग सभी घाटों पर छठ पूजा धूम धाम से मनाया जाता है. खासकर डालटनगंज के पुल के नीचे वाला दोनों घाट. अब शहरवासी सिंगरा में जहां कोयल-अमानत का संगम है वहाँ हजारों के संख्या में छठ का आनंद लेते हैं और गंगा आरती के रूप में नदी की आरती भी करते हैं जो काफी आकर्षक होता है.
केचकी जहाँ कोयल और ओरंगा नदी का संगम है ये पलामू का सबसे बड़ा पिकनिक स्पॉट बन चूका है. इस पर बना पुल तो सेल्फी ले कर डीपी लगाने का सबसे पंसदीदा जगह बन चूका है. नये साल पर तो यहाँ लोगों का सैलाब उमड़ जाता है.
सावन के महीने में लगने वाला झूलन भी इसी नदी के किनारे लगता है.
शाहपुर-मेदिनीनगर पुल जिसका नाम अब 'पूरनचंद सेतु' हो चूका है गढ़वा-मेदनीनगर मुख्य मार्ग को जोड़ता है और शहर का मुख्य मार्ग है, यह भी फोटो खिंचवा के डीपी लगवाने के लिए मशहूर है. अभी हाल में ही अभिनेता अर्जुन रामपाल अपनी आने वाली फिल्म '#नास्तिक' फ़िल्म की शूटिंग यहीं कर रहे थे.
जब पूल नहीं था तो इस पर नाव चलता था, कुछ लोग तैर कर भी आते थे.
मंडल डैम कोयल को बांध कर ही बनाया गया है. जिससे 25 मेगावाट बिजली की उत्पादन होगी परन्तु गेट नहीं लग पाने के वजह से यह चालू नहीं हो पाया. इसके चालू होने के बाद बिजली के साथ-साथ सालों भर पानी भी उपलब्ध हो पाएगी. मोहम्मद गंज में एक बराज भी है जिससे बिहार औरंगाबाद के इलाके भी लाभान्वित होते हैं.
शहर और गांवों का विकास तो हो रहा है, परंतु सभी लघु उद्योंगो एवं नाली-गटर की गंदगी सीधे नदी में छोड़ दी जाती है. जिससे नदी गन्दी हो रही है. साफ देखा जा सकता है कि किनारों पर पानी का रंग काला है मेदनीनगर में.
कितनी कहानियाँ हैं कि बाढ़ मे कोई कोयल में बह गया और सीधे गंगा में मिलते हुए समंदर मे विलीन हो गया.
आइए हम अपनी जीवन रेखा को नमन करें जिससे हम उपजे हैं और हमारा पलामू पोषित है.
© Sunny Shukla
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