Thursday, August 9, 2018

धनेसरी

हमारे दरवाज़े पर आना और प्यार से आवाज़ लगाना 'लकड़ी रख ले मउसी'। बचपन मे ये सुनना हमारी आदत सी थी, क्योंकि वो हर बाज़ार वाले दिन आती थी। हमारे गाँव में शनिवार और मंगलवार दो दिन बाज़ार लगता है। और दोनों दिन ये आवाज़ हम जरूर सुनते थे।

गाँव से दूर, पहाड़ियों के पीछे इनका घर था। खाने-पीने की जरुरतो के लिए हर बाज़ार के दिन जंगल से लकड़ी काट के लाना और आसपास के गांव में बेचना ही उसका पेशा था। पर न जाने क्यों, जब से मेरी दादी से उसने रिश्ता बनाया था तबसे वो आसपास के गांव की जगह सिर्फ मेरे घर ही आती थी, मेरा घर ही उसका बाज़ार हो गया था।

ऐसे ही एकदिन लकड़ी लेकर आयी थी बेचने, और बेचने के बाद बात-बात में दादी से पता चला कि उसकी माँ का घर भी दादी के मायके के आसपास ही था। बस उस दिन से दादी उसकी मउसी हो गयी और वो हमलोग की फुआ। अब तो मानो मौसी-बेटी के प्यार के आगे कुछ था ही नही! हर बाजार के दिन वो लकड़ी का बोझा लेकर आती जिसमें बाकी लोगो से ज्यादा मात्रा और ज्यादा सुखी हुई लकड़ियाँ होती थी। भले ज्यादा लकड़ी देखकर रास्ते मे आने समय कितने लोग उससे लकड़ी माँगते, पर वो उतनी दूर से लगभग 100 घर पार कर के मेरे ही घर लकड़ी देती। कभी पैसा रहा तो पैसा, न रहा तो चावल और कभी बिना पैसा लिए भी दे देती। वो इसलिए नही कि अगले बार मिल जायेगा, बल्कि इसलिए कि मउसी के लिये लाया लकड़ी किसी दूसरे को कैसे दे देती! अब अगर किसी बाजार को वो नही आये तो मउसी की भी बेचैनी बढ़ जाती। दादी बाकी लकड़ी बेचने वाली से पूछने लगती कि धनेसरी ना आइलक हो! आज नइखे आइल का? अब इस बेचैनी का राज कोई न जान पाया।

लकड़ी तो एक बहाना था दोनो को मिलने का। लकड़ी रखने के बाद दादी बिना कुछ खिलाये कभी नही जाने देती।कभी-कभी अगर शाम हो जाता तो प्लास्टिक में कुछ भी खाने का सामान बांध के दे देती, और ऐसा नही था कि ये एकतरफा था। वो भी साल भर कुछ न कुछ लेकर आते ही रहती थी जैसे - करील, खुखड़ी, कनवद , बैर, मकई! जब भी जिस चीज का सीजन रहे लाकर दे देना था। अगर दादी गलती से कुछ देने लगती उसके बदले तो कभी न लेती। हमेशा कहती- "फुआ हियई तो लइकन ला कुछु न लनतीअई, इहो सब का सोचतथी कि फुआ हर घरी अइसही आ जायेला!"  वो अपने साथ आये औरतों से उराँव भाषा मे कुछ बात करती थी, और हमलोग उसका नकल कर के चिढ़ाने, गुस्सा दिलाने की कोशिश भी करते। पर वो चिढ़ती ही नही थी। उपर से जब दादी डांटने लगती तो दादी को ही मना करती थी, कहती" छोड़ न दे मउसी, अब लइकन फुआ से ना खेलतथी तो केकरा से खेले जइतथीन।"

बचपन से चला ये सिलसिला बड़े होने तक चलता रहा। हमलोग भी फुआ -फुआ कहते रहे, वो भी सबको भाई-भउजी दीदी बोलते रही। यहाँ तक कि कभी उसके पति भी आते तो खाली हाँथ नही आते। जरूर कुछ न कुछ सीजन के हिसाब से जो भी होता साथ लाते और लाते भी क्यों नही ससुराल जो था। आने के बाद उनका स्वागत भी एक दामाद की तरह होता। खाना पीना खिला के कुछ विदाई के बहाने चावल-दाल जो भी रहता वो दादी दे देती कि घर मे काम लगेगा या धनेसरी फुआ को दे देने।

जब दादी गुजर गयी तो पूरा दिन भर आकर रोयी थी। और काम भर जितना पतल-दोना लगा सारा वो खुद अपने घर से बना के रोज-रोज आकर पहुंचा के गयी। और इसके लिए एक रूपया भी नही ली।पापा लोग बहाना भी बनाये देने के लिए कि ये सब मे पैसा किसी का नही रखना चहिये, तो बोली कि "मउसी के काम ला हम पइसा लेब, हमर कोई न हलक का?"

उसके 1-2 साल बाद वो भी गुजर गयी। गये थे सब समान लेकर उसके घर काम-क्रिया के दिन। माँ भेजी थी तब। पर पता नहीं क्यों बहुत ज्यादा उदास लगने लगा! बहुत मुश्किल से अपनी भावनाओं को दबा कर वहाँ से निकल गया।

जैसे वो हर सीजन में  कुछ न कुछ जंगल से लेकर आती थी, ठीक उसी तरह उसके बेटे भी घर आकर दे जाते है। माँ से आकर कहते है "गोतनी भेजले हउ।" मउसी और बेटी के बीच निस्वार्थ भाव से बना वो रिश्ता आज भी कायम है। जरूरी नही रिश्ता खून का ही हो, कुछ रिश्ते प्रेम से भी बनते हैं। और वो ही सबसे टिकाऊ भी होते हैं। शायद ये रिश्ता भी उसी में से एक है।

©️ Anand Keshaw

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