#शिवबेल जैसा कि नाम से ही बिल्कुल स्पष्ट है, यहाँ पर #शिवलिंग भी है और बेल का पेड़ भी। शिव जी बेल के पेड़ के नीचे ही है। पर अब यहाँ पिछले साल ही मंदिर का निर्माण हो गया है। जैसे #शिवरात्रि का मेला #पलामू के लगभग हर क्षेत्र में लगता है वैसे यहाँ भी हर साल शिवरात्रि का मेला लगता है। ठीक से याद तो नहीं है कि आख़िरी बार कब गए थे मेला देखने कम- से-कम 10 साल से ज्यादा तो हो ही गया होगा। पर बचपन में कोई भी मेला ऐसा नहीं रहता था कि नहीं जाते थे। हर बार स्कूल में तो छुट्टी रहती ही थी, सो तैयारी 1 महीना पहले से ही शुरू हो जाता था। आए गए मेहमान लोग से जो भी #गोड़लगाई मिलता था सब #मेला के नाम से अलग रख लिया जाता था। अब बचपन मे कमाते तो थे नहीं और पॉकेट मनी वाला सिस्टम शायदे कउनो पलामू के घर में रहा हो। तो हमलोग के इनकम का एकमात्र उपाय यही रहता था। इसके अलावे गाहे-बगाहे सर-समान लाने में बचा हुआ #अठन्नी_चवन्नी रहता था। मतलब सब मिला जुला के 20-25 रुपया जमा कर के रखते थे।
उस दिन सुबह से ही अलग माहौल रहता था। घरे माई चाची लोग का तो पूजा, उपवास रहता था। पर हमलोग का अलग, चाचा घर मे शिव जी का चबूतरा में पूजा करते थे और एक बाहर में #बिंदु_चाचा के कुआँ के पास शिव जी का चबूतरा था, तो वहाँ भी पूजा वही करते थे। साथ-साथ में उनके पूजा का सामान पानी ये सब लेकर जाने का काम मेरा ही रहता था और इस काम में उस समय अलग ही आनंद आता था।
दिन के लगभग 1 -2 बजे से ही एकदम बाल में तेल लगा के कपड़ा पहिन के तैयार हो जाते थे और फिर इंतज़ार होता था #महतो_बाबा का। वैसे तो उ घर के #हरवाहा थे, पर हमलोग के लिए तो बस महतो बाबा ही थे। हर आसपास लगने वाले में मेला के लिए विशेष बख़्शिश का नियम रहता था। चूँकि मेला घर से लगभग 2 -3 km दूर लगता था, इसलिए मेला घुमाने का जिम्मा उन्हीं का रहता था। जब वो आ जाते तो दादी बाबा को बुलाती , फिर बाबा सबको उसके उम्र के हिसाब से 5 -10 महतो बाबा को अलग से 20-30 रुपया पकड़ा देते। उसके बाद हमलोग निकल जाते थे मेला के लिए। अब कुछ दूर तो पूरा तेज चलते, लेकिन अब बच्चा थे आखिर केतना चलते। चलते-चलते थक जाते तो महतो बाबा उठा के कंधा पे बैठा लेते थे और कसम से कंधा पर बैठ के मेला से आते-जाते लोगों को देखना ऐसा लगता था जैसे #वॉच_टावर पर चढ़ के पूरा मेला पर नजर जमाये हुए हैं।
मेला पहुँचने से पहिले गिनती करते कि केतना लोग आया है। इसके बाद सब एक-दूसरे का हाथ पकड़ के इधर-उधर घूमते। पसन्द के खिलौना का दाम पूछ-पूछ के हिसाब लगाते कि पॉकिट में जेतना पैसा है उसमें आ तो जाएगा न। अगर नहीं आए तो फिर दिमाग मे उथल-पुथल कि किसको ले, किसको छोड़े। फिर अंत मे 2-3 खिलौना ले लेते। असली #मोलाई करने का अनुभव तो हमलोग को मेला से ही मिलता था और यहाँ मोलाई करना हमारा शौक नहीं मजबूरी रहता था। यहाँ का अनुभव अभी तक काम आ रहा है मुंबई-दिल्ली से लेकर कहीं भी काम कर जाता है।
सब खरीदने के बाद जब शाम होने लगती, तो भूख भी लग जाती। अब हम भले 5 साल के थे लेकिन पलामू के लईकन में घर के #
©Anand Keshaw
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